काव्य :
प्रेम की आँच
चासनी से भी ,
मीठी मुस्कान के साथ,
रसोई में जीवन साथी
संग करते हुए बात ।
लगती नहीं है ,
ज़रा-सी भी थकान,
चाहे मालपुए बनाओ,
चाहे ढेरों पकवान।
चासनी-सी मिठास ,
रिश्तों में घुल जाती है,
थोड़ी कहीं रही-सही,
कड़वाहट भी धुल जाती है।
जीवन साथी संग हँसते हैं
खिल खिलाते हैं,
आँखों-आँखों में एक दूजे,
की अहमियत बतलाते हैं।
झरोखे से आती रोशनी,
सीखा देती है यह बात,
साथ हो तो साधारण पल,
भी बन जाते हैं सौगात।
घर नहीं, तब बनता है ,
सच्चा संसार,
जहाँ प्रेम की आँच हो,
और अपनापन आधार।
-अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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