काव्य :
सन्दूक
माँ ने एक सन्दूक सहेज रखा है !
चाबी बंधी है - क़मर की गिरह से
मैं खीझता हूँ, सन्दूक पर
और, ललचाती है पत्नी चाबी पर.
माँ !
सब समझकर भी मुसकुराती रहती है
कभी खोलकर सन्दूक नहीं दिखाती है.
पता नहीं ---
सूने क़मरे के मरते ऊजाले में
क्या टटोलती है ? क्या सहेजती है ??
आज, माँ नहीं है !
सन्दूक है हमारे पास
और, चाबी भी कहीं यहीं आसपास.
उत्सुक पत्नी ने सकुचाते हुए
झटके से सन्दूक खोल ही दिया
मेरी मौन स्वीकृति को तौल ही लिया.
एक़बारगी, चौंक ही उठा : मैं !
पहचानी गंध से गमक उठा घर
कुछ सजीले कपड़े - ढ़ेरों टूटे खिलौने और,
‘सपनों की सीली गठरी’
छितरा गई आसपास
मेरा ‘बचपन’ बिख़रा हुआ था अनायास.
- अनुपम त्रिपाठी , भोपाल
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