हिन्दी साहित्य में प्रतिबिंबित विवेकानंद और उनके विचार
---पद्मा मिश्रा ,जमशेदपुर
विवेकानंद वह मार्गदर्शक थे जिन्होंने भारत के युवाओं की नब्ज को पहचाना था पूरी जनता के बीच नवांकुरों को जोड़ा व उत्साह से भरपूर युवाओं को देश व समाज के नवनिर्माण से जोड़ा था ,सही अर्थों में वे युग दृष्टा थे उन्होंने समाज को परिवर्तित करने का माध्यम आत्मबल और आध्यात्म को बनाया था उन्होंने समाज को परिवर्तित करने का माध्यम राजनीति और धर्म विशेष को ना बनाकर आध्यात्मिक शक्ति को बनाया था अध्यात्म वह, जो सत्य का प्रतीक हो ,लोक निर्माण की भावना से परिपूर्ण हो और मानवतावाद की स्थापना करें ,,मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना सिखाए । हिंदी साहित्य में गुप्त जी ने विवेकानंद के विचारों को अपने सृजन में उतारते हुए लिखा था
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती
मानव का धर्म है कर्म करना मानव मात्र से प्रेम करना अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे,। हिंदी साहित्य के छायावाद और छायावादोत्तर काल के लगभग सभी प्रमुख कवि और साहित्यकार विवेकानंद से प्रभावित हुए हैं चाहे पंत, प्रसाद व निराला हो या आगे नवीन जैसे कवि सभी ने समाज को रूढ़ियों के अभिशाप से मुक्त कर नए ज्ञान विकास व विचारधारा के सूर्य को उर्जस्वित करने का कार्य अपने ृृृसृजन के माध्यम से किया नवीन ने लिखा कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल हो जाए एक हिलोर इधर से आए एक हिलोर उधर से आए त्राहि त्राहि रवि नभ में छाए । निराला ने जो स्वयं बंगाल की पृष्ठभूमि से आए थे विवेकानंद के आदर्शों को अपने साहित्य सर्जन व जीवन में भी उतारा था ,देश के हर गरीब की पीड़ा उनकी अपनी पीड़ा थी वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता पेट पीठ दोनों मिलकर है एक ,,चल रहा लकुटिया टेक। मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को और वहीं पर पंत जी ने विवेकानंद के विश्व बंधुत्व की भावना को स्वयं आत्मसात कर प्रकृति और मानव के प्रेम की एक अपूर्व परिभाषा ही गढी थी सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूर्ण फिर घर में ओझल हो सके या शशि में ओझल हो घन।
विवेकानंद जी में ईश्वर को देखने उसका साक्षात्कार करने की तीव्र लालसा थी। वे देखना चाहते थे कि जिससे संपूर्ण सृष्टि का नियामक नियंता मानते हैं जो सभी धर्मों परंपराओं विचारधाराओं के मूल में है। वह ईश्वर कैसा है? रामकृष्ण परमहंस ने उनके ईश्वर से उन्हें मिलाया था। मानसिक साक्षात्कार के द्वारा यह बात कल भी हो सकती है या कथा मात्र भी पर इस ईश्वर का साक्षात्कार उनके लिए सत्य का साक्षात्कार था उस सत्य के लिए वह आजीवन भटकते रहे थे शायद विवेकानंद की ईश्वर को जानने की जिज्ञासा का प्रतिबिंब पंत जी के कार्य में परिलक्षित होता आया था । नहीं कह सकता तुम हो कौन न जाने नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन, अथवा कौन तुम मेरे हृदय में इस घटना का रोचक उल्लेख डॉक्टर नरेंद्र कोहली तोड़ो कारा चोरों में किया गया है स्वामी जी के उदात्त विचारों ने भारतीय युवा के जनमानस में गहरी जड़ें जमा ली थी वह उनके प्रेरणास्रोत भी रहे,, राष्ट्रीय आंदोलनों में पकड़े गए क्रांतिकारियों के पास गीता के अतिरिक्त स्वामी विवेकानंद की जीवनी भी होती थी, समाज सुधार आंदोलनों के जनक रहे राजा राममोहन राय के उत्तराधिकारी थे स्वामी विवेकानंद पूर्व और पश्चिम का पूर्व और पश्चिम की अभिव्यक्ति वर्तमान विचारधाराओं को भारतीय संस्कृति के अनुरूप उदात्त परिवर्तनों को आत्मसात करने की ओर एक ठोस कदम भी उठाया और दोनों को जोड़ने के लिए पुल का कार्य भी किया था ,वे मानते थे कि जब तक चेतना विकसित नहीं होगी विकास नहीं होगा मनुष्य तो पहले स्वयं पर विश्वास करना होगा फिर ईश्वर उत्तिष्ठ जागृत वरान्निबोधत ,
अपने शिकागो में दिए गए भाषण के द्वारा उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि उनका चिंतन विश्वबंधुत्व के शिखर को छूता है व साहित्य का पथ प्रदर्शक भी हो सकता है, जिसके द्वारा जागरण का संदेश पूरी दुनिया ने देखा सुना और समझा था नारी विमर्श और समानता सती प्रथा बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के विरोध में और दलितों गरीबों के उत्थान के लिए भी विवेकानंद सतत प्रयत्नशील रहे थे ,,इन सब का उद्धार एकमात्र शिक्षा के द्वारा ही हो सकता है यह बात उन के माध्यम से मील का पत्थर साबित हुई थी, शिक्षा मन की अज्ञानता को दूर करने का सशक्त माध्यम बन सकती है ,,इसका प्रचार और पश्चिम से विज्ञान-टेक्नॉलॉजी देश में लाने के पक्षधर भी रहे थे विवेकानंद।निराला ने अपनी रचना वह दीन दलित भारत की ही विधवा है अथवा पंत साहित्य में एक नहीं दो-दो मात्राएं नर से भारी नारी स चमुच विवेकानंद ने देश और समाज साहित्य को बहुत कुछ दिया वह ज्ञान और अमृत जो साहित्य के माध्यम से उनके विचारों से अनुप्राणित होकर समाज के निर्माण में सहायक बन सका स्तुत्य है शक्ति के विद्युत कण जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं हो निरुपाय
समन्वय उनका करें समस्त
समन्वय उनका करें समस्त
बिजयिनी मानवता हो जाय।
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