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सरोकार : गाँवों में एक तिहाई लोगों को स्वच्छ पानी मयस्कर नहीं - डॉ. चन्दर सोनाने , उज्जैन


 

सरोकार : 

गाँवों में एक तिहाई लोगों को स्वच्छ पानी मयस्कर नहीं

       -  डॉ. चन्दर सोनाने , उज्जैन

                       मध्यप्रदेश के इन्दौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 18 लोगों की जान जाने के बाद अब एक और खबर आई है वह यह कि मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 36.7 प्रतिशत जगह नल का पानी पीने योग्य नहीं पाया गया। विश्व में भारत की अर्थव्यवस्था चौथे स्थान पर होने के दावे के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की यह खबर शर्मनाक है।

                        ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के हालात बयां करने वाली यह खबर केन्द्र सरकार की है। हाल ही में 4 जनवरी 2026 को जल जीवन मिशन की फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 36.7 प्रतिशत पेयजल सैंपल असुरक्षित पाए गए हैं। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि पानी का हर तीसरा गिलास पीने योग्य नहीं पाया गया है। जल जीवन मिशन के अन्तर्गत हर घर तक साफ पानी पहुँचाने के दावे की हकीकत केन्द्र की उक्त रिपोर्ट में हाल ही में सामने आ गई है।

                         केन्द्र सरकार ने सितम्बर-अक्टूबर 2024 में मध्यप्रदेश के 15 हजार से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों से पीने के पानी के सैम्पल लिये थे। अनेक सैंपलों में बैक्टीरिया और रासायनिक गड़बड़ियाँ पाई गई। देश में सबसे स्वच्छ शहर इन्दौर जिले में 100 प्रतिशत घरों में नल कनेक्शन होने के बावजूद 33 प्रतिशत घरों में ही पीने योग्य पानी पहुँच रहा है ! अनूपपुर और डिंडोरी जिले में तो और भी खराब हालत है। इन दोनों जिलों में एक भी सैम्पल सुरक्षित नहीं मिला। बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा जिले में 50 प्रतिशत से ज्यादा सैम्पल दूषित मिले। अन्य जिलों की भी कमोबेश यही स्थिति है। ये आँकड़े प्रदेश सरकार के लिए शर्मनाक है।

                           केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी और अत्यन्त महत्वपूर्ण जल जीवन मिशन के अन्तर्गत 28 जुलाई 2024 तक देशभर में 78 प्रतिशत घरों में नल चालू है। किन्तु मध्यप्रदेश में क्वालिटी चेक की कमी के कारण हर साल हजारों लोग सुरक्षित पेयजल नहीं होने के कारण बीमार हो रहे हैं। मध्यप्रदेश की इस हालत को देखते हुए केन्द्र सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार को चेतावनी दी है कि अगर पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं किया तो 2026 में मिलने वाले आवंटन को घटाया जा सकता है। केन्द्र सरकार ने मध्यप्रदेश की इस स्थिति को व्यवस्था जनित आपदा बताया है।

                          देश के हर राज्य के ग्रामीण अंचलों में ग्रामीणों को नल द्वारा शुद्ध पेयजल मिल सके इसके लिए जल जीवन मिशन शुरू किया। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण मिशन है। किन्तु राज्यों की लापरवाही के कारण ग्रामीणों को इस योजना का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में हम बात करें तो मध्यप्रदेश के सरकारी आँकडों के अनुसार 99.1 प्रतिशत गाँवों में हर घर जल योजना के तहत पाईप डाल दिए गए हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि 76.6 प्रतिशत घरों में ही सही तरीके से नल काम कर रहे हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि हर चौथा घर अब भी इस महत्वपूर्ण योजना के लाभ से वंचित है।

                         जल जीवन मिशन की फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट में हर तीसरे घर में पीने का पानी सुरक्षित नहीं पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार 33 प्रतिशत घरों में नल का पानी गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गया है। यानी बड़ी आबादी को मिलने वाला पानी पीने के लिहाज से सुरक्षित नहीं है। इसके अतिरिक्त नल से दिये जाने वाले पीने के पानी की मात्रा भी तय मानक से कम पाई गई है। सरकारी मानक के अनुसार 55 लीटर पानी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। किन्तु मध्यप्रदेश के 30 प्रतिशत घरों को यह तय मात्रा नहीं मिल पा रही है। कई क्षेत्रों में तो पानी रोज आता ही नहीं है। यहीं नहीं पानी प्रदाय का समय भी तय नहीं है।

                         जल जीवन मिशन के अन्तर्गत नल से दिए जाने वाले पानी पर लोगों का पूरा भरोसा भी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार 63 प्रतिशत से ज्यादा परिवार पानी को उबालकर, छानकर या ट्रीट करने के बाद ही पानी का उपयोग करते हैं। यह सरकारी जल आपूर्ति प्रणाली पर भरोसे की कमी को भी दिखाता है। यही नहीं मध्यप्रदेश के 26.7 प्रतिशत स्कूलों में पानी का सैम्पल माइक्रोबॉयोलॉजिकल टेस्ट में फेल पाया गया है। अर्थात स्कूलों में बच्चों को मिलने वाला पानी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

                          केन्द्र सरकार की इस अत्यन्त महत्वपूर्ण जल जीवन मिशन का उद्देश्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। गाँवों के लोगों को पानी के लिए भटकना नहीं पड़े और उन्हें अपने घर में ही नल से पानी मिल सके। इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या व्यवस्था की सामने आ रही है। इस मिशन में अब जो चुनौती आ रही है वह नल की नहीं है, बल्कि मेंटेनेंस, ट्रीटमेंट और मॉनिटरिंग की है। अनेक गाँवों में क्लोरीनेशन सिस्टम या तो है ही नहीं, या है तो वो पूरी तरह से सही काम नहीं कर रहा है। इसके साथ ही एक और कमी यह पाई जा रही है कि नल से मिलने वाले पानी के मासिक शुल्क की वसूली अत्यन्त कमजोर है। इससे मेंटेनेंस टिकाऊ नहीं बन पा रहा है।

                               इसमें कोई शक नहीं कि देश में जल जीवन मिशन का अत्यन्त महत्व है। किन्तु इसके क्रियान्वयन में अनेक कमियों में एक महत्वपूर्ण कमी यह भी है कि गांवों में इस मिशन के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पंचायतों और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को दे रखी है। इन दोनों विभाग में समुचित समन्वय नहीं होने से इस मिशन का पूरा लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कर्मचारी भी पंचायत के अधीन नहीं है। पंचायतों के पास पर्याप्त आवंटन भी नहीं होता है, जिससे कि वे पानी को नियमानुसार ट्रीटमेंट कर सके और स्वच्छ जल प्रदाय कर सके। यदि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के ग्रामीण क्षेत्र में काम कर रहे स्टाफ को पूरी तरह पंचायत के अधीन कर दिया जाए, तो वे और सही तरीके से काम कर सकेंगे। आमजन की भी यह जिम्मेदारी है कि उन्हें जब अपने घरों में ही नल से पीने का पानी मिल रहा है तो वे भी नियमानुसार निर्धारित किया गया मासिक शुल्क समय पर जमा करें। इस पूरी व्यवस्था की नियमित समीक्षा भी आवश्यक है। इससे जहाँ भी कमी पाई जाए, उस कमी को समय पर दूर किया जा सके। यह सब होगा तो निश्चित रूप से जल जीवन मिशन अपने उद्देश्यों को पूरी तरह से प्राप्त कर सकेगा, अन्यथा ऐसा ही चलता रहेगा !

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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