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काव्य : ख्वाहिशों की दुनिया - प्रमोद सामंतराय ,सरायपाली


 काव्य : 

 ख्वाहिशों की दुनिया


चारों ओर हरियाली होगी, पेड़ों से भी बातें होंगी, 

चिड़ियों की चहक होगी, पंछियों से मुलाकातें होंगी। 

खुली हवा में जी भर कर, मैं सांस लेना चाहता हूं, 

यही वो ख्वाहिश है, जिसे मैं पाना चाहता हूं।


नहीं होगी शंका कोई, ना डर किसी की आंखों पर,

दिन हो या रात, बेटियां बेधड़क घूमेंगी सड़कों पर।

निश्चिंत हर माता-पिता को, मैं देखना चाहता हूं,

यही वो ख्वाहिश है, जिसे मैं पाना चाहता हूं।


आंखों में होगी शर्म, दिलों में भी सम्मान होगा,

हर माता-पिता को अपने, ऐसे बच्चों पर गुमान होगा।

हर परिवार हो ऐसा, जिनपर मैं गर्व करना चाहता हूं,

यही वो ख्वाहिश है, जिसे मैं पाना चाहता हूं।


जानता हूं कठिन है डगर, उम्मीदें रखता हूं बेवजह,

रह जाएंगी यह भी अधूरी, मेरे ही ख्वाबों की तरह,

न जाने फिर भी क्यों, मैं इन्हें पाना चाहता हूं।

मैं बस इन्हीं ख्वाहिशों की दुनिया में जीना चाहता हूं।


 - प्रमोद सामंतराय 

सरायपाली महासमुंद (छ.ग.)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. उम्मीदें कभी बेवजह नहीं होतीं हैं, आदरणीय और ख्वाब पूरे होने की उम्मीदें तो कतई नहीं। बहुत ही प्रेरणास्पद रचना है आपकी नमन है आपकी ख्वाइशों को 🙏🏻

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