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देवनागरी से डिजिटल मस्तिष्क तक: हिंदी की सभ्यतागत यात्रा - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


 

[प्रसंगवश – 10 जनवरी: विश्व हिंदी दिवस]

देवनागरी से डिजिटल मस्तिष्क तक: हिंदी की सभ्यतागत यात्रा

[एआई को मानवीय बनाने की भाषा: हिंदी का वैश्विक दायित्व]

[विश्व मंच पर भारत की आवाज़: हिंदी, एआई और मानवीय मूल्य]


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


जब कोई भाषा युगों की चेतना को समेटे हुए भविष्य की तकनीक से संवाद करने लगे, तब वह केवल संप्रेषण का साधन नहीं रहती, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और दिशा बन जाती है। विश्व हिंदी दिवस 2026 इसी ऐतिहासिक परिवर्तन का सशक्त प्रतीक है। 10 जनवरी को मनाया जाने वाला यह दिवस केवल हिंदी के गौरवगान तक सीमित नहीं, बल्कि उसकी निरंतर विकसित होती वैश्विक भूमिका का उद्घोष है। इस वर्ष की थीम “हिंदी: पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक”, यह स्पष्ट करती है कि हिंदी अतीत की धरोहर और भविष्य की तकनीक के बीच सेतु बनकर खड़ी है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि हिंदी केवल स्मृति नहीं, बल्कि संभावना है।

विश्व हिंदी दिवस की पृष्ठभूमि हिंदी की वैश्विक यात्रा की गाथा है। 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। वर्ष 2006 में इसे आधिकारिक रूप से विश्व हिंदी दिवस घोषित किया गया। आज हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जिसे 60 करोड़ से अधिक लोग मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और करोड़ों इसे समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी अब केवल जनभाषा नहीं, बल्कि वैश्विक संवाद की सशक्त दावेदार बन चुकी है।

हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसका पारंपरिक ज्ञान है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, आयुर्वेद और योग जैसे ग्रंथ मानव सभ्यता को जीवन दर्शन, नैतिकता और संतुलन का मार्ग दिखाते हैं। यह ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और व्यावहारिक भी है। आयुर्वेद की औषधियाँ आधुनिक चिकित्सा में स्थान बना रही हैं और योग को वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन के रूप में स्वीकार किया गया है। यह समस्त ज्ञान हिंदी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा और आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में हिंदी की भूमिका ऐतिहासिक मोड़ पर है। भारत एआई मिशन के अंतर्गत हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में स्वदेशी बड़े भाषा मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि भारतीय संदर्भों, मूल्यों और सांस्कृतिक संवेदनाओं के अनुरूप एआई का निर्माण है। हिंदी में एआई शिक्षा को व्यक्तिगत, कृषि को वैज्ञानिक और स्वास्थ्य को समग्र बना रही है। प्राचीन ग्रंथों का डिजिटल अनुवाद और विश्लेषण अब तकनीक के माध्यम से संभव हो रहा है।

वर्ष 2026 में भारत द्वारा आयोजित भारत एआई इम्पैक्ट समिट हिंदी की तकनीकी क्षमता को वैश्विक मंच प्रदान करता है। इस सम्मेलन में भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, में जिम्मेदार और नैतिक एआई पर विशेष जोर दिया गया है। देवनागरी लिपि की ध्वन्यात्मक संरचना एआई के लिए अत्यंत उपयुक्त है। भारतीय स्टार्टअप्स हिंदी आधारित चैटबॉट, वॉइस असिस्टेंट और ज्ञान मंच विकसित कर रहे हैं। इसरो के गगनयान मिशन में हिंदी संवाद यह सिद्ध करता है कि अंतरिक्ष जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में भी हिंदी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है।

हिंदी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का यह संगम केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है। यदि एआई को केवल विदेशी भाषाओं और संदर्भों में प्रशिक्षित किया जाए, तो वह स्थानीय संवेदनाओं से कट सकता है। हिंदी आधारित एआई भारतीय समाज की विविधता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों को बेहतर ढंग से समझ सकता है। यह एआई न केवल सूचना देगा, बल्कि विवेकपूर्ण और संवेदनशील निर्णयों में सहायक बनेगा। यही कारण है कि हिंदी एआई का विकास भविष्य की अनिवार्यता बन चुका है।

हालाँकि हिंदी के समक्ष चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी सामग्री की कमी, अंग्रेजी-प्रधान एआई मॉडल और डिजिटल साक्षरता का अभाव प्रमुख बाधाएँ हैं। अनुवाद में त्रुटियाँ और तकनीकी संसाधनों तक सीमित पहुँच भी चिंता का विषय हैं। फिर भी 2026 आशा और अवसरों का वर्ष है। वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ हिंदी वॉइस टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ा रही हैं और भारतीय प्रयास स्थानीय भाषाओं को केंद्र में ला रहे हैं। यदि संस्कृत और हिंदी ग्रंथों को एआई प्रशिक्षण डेटा बनाया जाए, तो हिंदी वैश्विक एआई में अग्रणी बन सकती है।

हिंदी की समावेशी प्रकृति उसे भारत की राष्ट्रीय एकता का आधार बनाती है। यह 22 अनुसूचित भाषाओं को जोड़ने वाली सेतु है और इसमें संस्कृत, फारसी, अरबी सहित अनेक भाषाओं का प्रभाव समाहित है। यही विविधता इसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाती है। प्रवासी भारतीयों के लिए हिंदी सांस्कृतिक स्मृति और पहचान का माध्यम है। अब एआई के माध्यम से हिंदी सीमाओं से परे जाकर भारतीय ज्ञान और मूल्यों को विश्व तक पहुँचा रही है।

भविष्य की दृष्टि से हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने की क्षमता रखती है। शिक्षा में हिंदी-एआई पाठ्यक्रम, विश्वविद्यालयों में पारंपरिक ज्ञान आधारित तकनीकी अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी प्रस्तुतियाँ इसे नई ऊँचाइयों तक ले जाएँगी। विश्व हिंदी दिवस को यदि एआई और भाषा के वैश्विक संवाद का मंच बनाया जाए, तो हिंदी नवाचार और मानवीय मूल्यों का केंद्र बन सकती है।

अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल संसार तक, प्रयोगशालाओं से लेकर कक्षाओं तक, हिंदी की उपस्थिति भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को सुदृढ़ कर रही है। गगनयान जैसे मिशनों में हिंदी संचार बढ़ना यह संकेत देता है कि भविष्य की तकनीक भारतीय भाषाओं के साथ आगे बढ़ेगी। हिंदी का यह तकनीकी विस्तार भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार का नेतृत्वकर्ता बनाएगा।

विश्व हिंदी दिवस 2026 केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि हिंदी के वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाला एक गहन वैचारिक संकल्प है। यह संकल्प इस विश्वास पर आधारित है कि हिंदी अपनी सांस्कृतिक जड़ों, नैतिक मूल्यों और ज्ञान परंपरा को सुदृढ़ रखते हुए आधुनिक विज्ञान और उभरती तकनीकों का नेतृत्व कर सकती है। “हिंदी: पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक” की थीम यह स्पष्ट करती है कि सच्ची प्रगति वही है जिसमें तकनीकी नवाचार मानवीय संवेदना, विवेक और करुणा से जुड़ा हो। इस 10 जनवरी को हम सामूहिक रूप से यह प्रण लें कि हिंदी को केवल संवाद की नहीं, बल्कि नवाचार, मानवीय मूल्यों और वैश्विक समझ की सशक्त भाषा बनाएँ। यही हिंदी की वास्तविक शक्ति, पहचान और विजय है — जय हिंदी।

 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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