काव्य :
हम वही झोपड़ी वाले है!
हमने क्या भ्रम पाले है,
कहते वो रख वाले है!!
रोटी दाल मुनासिब न था
आज हवेली वाले है!!
धाक बहुत है आज शहर में
सुना बड़े के साले है!!
सोचा गले मिलूंगा उनसे,
बाहर खड़े गन वाले है!!
कुत्ते पलते आज सैकड़ों,
निर्धन के हित ताले है!!
तन पर खादी चमक रही है,
लेकिन मन के काले है!!
चरणकमल है आज आपके
जनता के पद छाले है!!
वो बैठे हैं शीश महल में,
हम वही झोपड़ी वाले है!!
- सुरेश गुप्त ग्वालियरी
विंध्य नगर बैढ़न
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