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घनन घनन घंटा बाजे - विशाल शुक्ल , छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)


 

घनन घनन घंटा बाजे . . .

स्वतंत्रता के बाद से हमारे देश के हाल बेहाल है। इसके वावजूद कई स्वार्थी नुमाइंदे देश को हलाल और अलाल कर उसकी अर्थी निकालने में तुले हुए है। देश की यह दशा देखकर हमारे शहीद भी व्यथित मन से सोच रहे होंगे कि . . . “आखिर ! इतनी जल्दी भी क्या थी ? देश को स्वतंत्र कराने की। वैसे भी देश शंकर जी के नाम से खुल्ले ‘सांड’ तरह हमारा देश स्वतंत्र मदमस्त चल रहा है, जहां हर जिंदा लाश कैलाश बनकर खोखली व्यवस्था के घंटनाद पर मनमोहक नृत्य कर रही है। हालांकि घंटनाद (घंटे की ध्वनि) को ध्यान की एक पवित्र ध्वनि माना जाता है पर ठीक इसके विपरीत घटिया राजनीति की पराकाष्ठा पर जब यह खतरे का सूचक बनकर घनघनाती है तो लोकतंत्र की सांसे घंटे पर ही अटक जाती है। ‘घंटा’, समय और काल का भी संकेतक है, किसी का जब अंत समय आता है तो बातों ही बातों में कहा जाता है कि “यह घंटे भर का मेहमान है” वर्तमान में ‘घंटे’ पर चल रहे बेहूदा राजनीति के हास्य और दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग का अंजाम कितना बुरा होगा यह अभी से नजर आने लगा है, फलस्वरूप फूहड़ राजनीति के अंत का खतरे जनक सूचक ‘घंटा’ बजना चालू हो गया है। हमारी पुलिस भी इस समय अपराधियों को पकड़ने की जगह ‘घंटा’ पकड़ने में लगी है, और घंटा है कि मंदिरों से निकलकर विधानसभा और संसद तक जाने की तैयारी में है। एक समय वह भी था जब घंटा अनुशासन पालन का यंत्र हुआ करता था, जिसके बजते ही लोग अपने कार्य का प्रारंभ और अंत कर देते थे, लेकिन . . . अब यही घंटा आज राजनीति का काम तमाम करने पर तुला हुआ है, और करे भी क्यों ना ? आप जानते है ? कि घर और मंदिरों में हाथ से बजाई जाने वाली घंटी को गरुड़ घंटी कहते हैं, उसमें गरुड़ अंकित होते हैं। गरुड़ का स्वभाव विषैले सर्पों को दमन करने वाला होता है फिर चाहे वह सर्प राजनीति के हो या जंगल के।


विशाल शुक्ल

पातालेश्वर मार्ग 

छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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