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ज्ञानरंजन नहीं रहे - डॉ. सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र


 ज्ञानरंजन नहीं रहे

     शोसल मीडिया पर मित्रों की पोस्ट से जाना कि ज्ञान रंजन नहीं रहे, 90 वर्ष की आयु में यह शरीर छोड़ दिया उन्होंने। सबसो पहले डॉ. विपिन पवार ने बताया तो विश्वास ही नहीं हुआ। बांदा महोत्सव की तस्वीरें भी ही ते देखीं थीं, फिर भी सुनकर बड़ा अजीब सा लगा जैसे शरीर से में कुछ निकला जा रहा हो। एक तरह की ऐंठन, उमण घुमण, पता नहीं लेकिन बहुत कुछ उमेठा जा रहा था। कुछ दुरभिसंधियों के चलते मेरा मुंबई से जबलपुर 1985 के अंत में स्थानातांरण हुआ तो बहुत टूटा हुआ था। ज्ञान जी से कोई परिचय नहीं था। विभाग के लोगों से तो परिचय था ही और विशेषकर राजेंद्रबिहारी उपाध्याय वरिष्छ राजभाषा अधिकारी से तो नौकरी करने में कोई बाधा नहीं थी परंतु मानसिक स्तर पर एक रिक्तिता थी, जो पूरी की सीबीआई अधिकारी ईश्वरानंद आर्य और अरुण श्रीवास्तव जी ने प्रोफेसर ज्ञान रंजन जी मिलवा कर। यह मिलना दो व्यक्तियों की मुलाकात नहीं थी  वरन् एक यात्रा की शुरुआत थी। मुझ जैसे अकिंचन के सामने थे ज्ञानरंजन और इनकी वजह से हरिशंकर परसाई, उन्हींकी वजह से आकाशवाणी के तत्कालीन सहायक निदेशक लीलाधर मंडलोई व सुरेश पांडेय व आकाशवाणी की टींम, प्रगतिशील लेखक संघ के रचनाकार, विवेचना के कलाकार, साथ ही स्थानीय पत्रकार व अन्य लेखक कवि आदि रचनाकार। ज्ञानजी कच्चे घड़े को ऐसे तराशते थे, वह पक जाए और उसे अपने पके जाने का पता भी नहीं चले। अहंकार का लेश मात्र नहीं।

     जबलपुर पहुंचकर ही मैंने कहानी व कविता को समझा, जीवन का अंग बना पाया, चिंतन का उद्देश्य बना पाया। आकाशवाणी पर रचनाओं का प्रसारण तो मेरे लिए एक अचंभे की बात थी, मेरे सोच से भी बाहर की बात थी। इसी माहौल में अंग्रेजी और दर्शनशास्त्र से एम.ए. करना की सोची पर दोनो की प्रथम वर्ष की परीक्षा दे पाया । मुरलीधर नागराज, अरुण पांडेय, राजकुमार तिवारी सुमित्र, सतीश तिवारी, जयप्रकाश पांडेय, दानी जी, परिहार जी, मयंक जी जैसे लेखकों सान्न्ध्यि मिला। ज्ञान जी के यहां ही बाबा नागार्जीन और आलोक धन्वा के दर्शन प्राप्त हुए। 1990 के अंत में कोल्हापुर चला गया, जहां मुझे आयकर विभाग में सहायक निदेशक (राजभाषा) के पद पर प्रतिनियुक्ति मिल गई थी। परंतु पूज्य ज्ञानरंजन जी से संपर्क बना रहा।  परंतु पहल 125 (अंतिम अंक) जब मिला और केसरवानी जी कुछ पंक्तियां तथा ज्ञानरंजन जी की कुछ अतिरिक्त पंक्तियां हिलाकर रख गईं----

     ज्ञानरंजन जी ने सभी को याद किया और आखिर में नहीं रहा गया तो लिखा- अंत में, पहल के झोकों के सुगंध से भरने वाले दिवंगतों और जीवितों को हमारा सलाम और शुक्रिया—सर्वश्री राहुल बारपुते, मायाराम सुरजन, कमलेश्वर, श्याम कश्यप, वीरेंद्रकुम्र बरनवाल, सुदीप बैनर्जी, एल.के.जोशी, रमाकांत, कामरेड रतिनाथ मिश्र, विनोद कुमार श्रीवास्तब, अनूपकुमार, बुद्धिनाथ मिश्र, प्रकाश दुबे, सुधीर अग्रवाल, परितोष तक्रवर्ती, एन.के.सिंह, कमल्श अवस्थी, चमनलाल, रमेश मुक्तिबोध, संजीव कुमार, ईशमधु तलवार, यशवंत व्यास, निरुपमा दत्त, शंकर, शैलेंन्द्र शैल, सुशील शुक्ल, गुलाम मोहम्मद शेख, प्रदीप सक्सेना, दिवाकर झा, सत्येन्द्र सिंह ठाकुर आप सब बहुत याद आते हैं---ज्ञानरंजन।  

       ज्ञानरंजन जी की क्षति तो क्या पूरी होगी,  उनका कुछ भी अनुकरण बन जाए तो जीवन धन्य मानूं।


-    डॉ. सत्येंद्र सिंह,  पुणे, महाराष्ट्र


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. ज्ञानरंजन जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

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