व्यापार समझौते बनाम फोन डिप्लोमेसी
- डॉ हंसा व्यास
मोदी ने ट्रंप को फोन नहीं किया तो अमेरिका ने ट्रेड डील निरस्त कर दी । समझ नहीं आता कि क्या यह पारिवारिक धरातल पर होने वाला कोई कार्यक्रम था या दोस्तों की कोई पार्टी । किसी ने किसी को फोन नहीं किया तो सब कुछ निरस्त । समझ में नहीं आ रहा है कि अंतरराष्ट्रीय धरातल पर वैश्विक राजनीति का और उनके मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा है या यह केवल एक मजाक बनकर रह गया है । ट्रंप के मानसिक दिवालियापन के तो हर रोज एक न एक किस्से हम अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में देखते ही हैं और न्यूज़ चैनल में सुनते भी हैं ।
समकालीन वैश्विक राजनीति में ‘फोन-डिप्लोमेसी’ एक आकर्षक लेकिन भ्रामक अवधारणा के रूप में उभरी है। मीडिया विमर्श में यह धारणा बार-बार स्थापित की जाती है कि राष्ट्राध्यक्षों के बीच एक फोन कॉल, व्यक्तिगत संबंध या अनौपचारिक संवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय कर सकते हैं। किंतु यह दृष्टि राजनीतिक यथार्थ की जटिल संस्थागत संरचनाओं, विधिक प्रक्रियाओं और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को अत्यधिक सरलीकृत कर देती है। इस आलेख का उद्देश्य ‘फोन-डिप्लोमेसी’ के भ्रम का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करना है कि वास्तविक राजनीति व्यक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि संस्थागत और संरचनात्मक होती है।
‘फोन-डिप्लोमेसी’ मूलतः व्यक्तिगत कूटनीति का आधुनिक रूप है, जहाँ यह मान लिया जाता है कि शीर्ष नेतृत्व के बीच प्रत्यक्ष संवाद से जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का त्वरित समाधान संभव है। इसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण मीडिया और राजनीतिक प्रचार है, जो इसे नेतृत्व की सक्रियता और प्रभावशीलता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करता है।
फोन-डिप्लोमेसी’ आधुनिक राजनीति का एक दृश्यात्मक और प्रतीकात्मक पक्ष हो सकता है, किंतु इसे कूटनीति का वास्तविक आधार मान लेना एक गंभीर बौद्धिक त्रुटि है। संस्थागत राजनीति यह स्पष्ट करती है कि राष्ट्रों के बीच संबंध व्यक्तियों की इच्छा से नहीं, बल्कि नियमों, प्रक्रियाओं और राष्ट्रीय हितों से संचालित होते हैं। अतः परिपक्व लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक है कि वह व्यक्तिगत संवाद के आकर्षण से आगे बढ़कर संस्थागत वास्तविकताओं को समझे और उसी आधार पर राजनीतिक आकलन करे।
यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि वैश्विक मंच पर शक्ति का असली प्रमाण आक्रोश नहीं, बल्कि विवेक है।अंतर्राष्ट्रीय संबंध किसी व्यक्तिगत मनोभाव, आत्मसम्मान की तुष्टि या अनौपचारिक संवाद पर आधारित नहीं होते। वे संस्थागत प्रक्रियाओं, दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों, गोपनीय कूटनीतिक चैनलों, नियमों और परस्पर सहमति से तय शर्तों के अधीन संचालित होते हैं। ऐसे में यदि यह धारणा या समाचार गढ़ा जाता है कि *“एक राष्ट्राध्यक्ष ने दूसरे को फोन नहीं किया, इसलिए व्यापार समझौता रद्द कर दिया गया”*, तो यह न केवल वैश्विक राजनीति की गंभीरता को कमतर करता है, बल्कि कूटनीति को व्यक्तिगत अहंकार के स्तर तक गिरा देता है।
व्यापार समझौते कोई पारिवारिक या मित्रवत सामाजिक कार्यक्रम नहीं होते कि भावनात्मक प्रतिक्रिया में उन्हें रद्द कर दिया जाए। वे वर्षों की बातचीत, विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट, विधिक परीक्षण, आर्थिक प्रभाव आकलन और रणनीतिक संतुलन के बाद आकार लेते हैं। किसी भी देश का प्रधानमंत्री अपने व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि संविधानिक दायित्वों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप निर्णय करता है।
यदि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा यह संकेत दिया जाता है कि व्यापारिक निर्णय व्यक्तिगत संवाद पर निर्भर हैं , तो यह व्यवहार अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के स्थापित मानकों के विपरीत है। यह उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें वैश्विक राजनीति को एक “डील-शो” या निजी सौदेबाज़ी की तरह देखा जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ इस तरह का आचरण राजनीतिक अपरिपक्वता और वैचारिक दिवालियापन का संकेत देता है।
भारत आज विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उसकी विदेश नीति ‘व्यक्ति-केंद्रित’ नहीं बल्कि ‘राष्ट्र-केंद्रित’ है। प्राचीन काल से ही भारत ने अपनी नीतियों के केंद्र में राष्ट्र और राष्ट्र हित को रखा है।भारत अमेरिका सहित किसी भी देश के साथ व्यापारिक या रणनीतिक संबंध *बराबरी, पारस्परिक सम्मान और संस्थागत संवाद* के आधार पर तय करता है। यदि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर यह छवि बनाई जाती है कि भारत किसी व्यक्तिगत नाराज़गी के कारण समझौते खो देता है, तो यह भारत को नहीं बल्कि वैश्विक कूटनीति की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
दरअसल, ऐसे बयान भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि भारत के संयम और परिपक्वता को रेखांकित करते हैं। भारत ने कभी भी “फोन-डिप्लोमेसी” को औपचारिक कूटनीति का विकल्प नहीं माना। भारतीय विदेश नीति संवाद को प्राथमिकता देती है, लेकिन वह संवाद संस्थागत होता है, न कि व्यक्तिगत भावनाओं पर आधारित।
इस तरह की बयानबाज़ी एक और गंभीर खतरे की ओर संकेत करती है—अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का ट्विटर-युगीन सरलीकरण । जहाँ जटिल आर्थिक समझौतों को भी व्यक्तिगत अपमान या तात्कालिक प्रतिक्रिया के चश्मे से देखा जाने लगता है। यह प्रवृत्ति वैश्विक आर्थिक स्थिरता, निवेश विश्वास और बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए घातक है।
यह सर्वविदित है कि व्यापारिक समझौते राष्ट्रों के बीच होते हैं, व्यक्तियों के बीच नहीं। यदि कोई नेता इसे व्यक्तिगत संवाद की अनुपस्थिति से जोड़ता है, तो वह अपने देश की कूटनीतिक परंपरा को ही कमजोर करता है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे बयानों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय, अपने दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक हितों पर केंद्रित रहे—क्योंकि परिपक्व राष्ट्र शोर से नहीं, नीति से पहचाने जाते हैं।
- डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम
hansavyas5418@gmail.com
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