लघुव्यंग्य :
विश्व हिंदी दिवस -'हिन्दी चिन्दी चिन्दी'
झीलों ताल तलैयों की नगरी मे साहब ०९ जनवरी २६ एक अजूबा पेशे नज़र था। भारत भवन में 'लिट-फ़ेस्ट' हम कहें तो ' साहित्य मेला ' शुरू हुआ। वहां एक हिन्दी मंच "वागार्थ" ने अपनी दुकान सजाई थी। कभी हाई स्कूल में एक लेख- मानसिक दासता" पढ़ा था सारांश देश भले ही आज़ाद हो गये है पर दिल ओ दिमाग़ से हम अभी भी ग़ुलाम हैं। सोचिये वो पढ़ा था १९६२-६३ में और अब है २०२६ यानी इतने वर्ष बाद भी उस लेखक की सोच बरकरार है, हमारी दिल-ओ-दिमाग की ग़ुलामी के स्तर अब भी वही के वहीं है।
हां तो मैं क्या कह रहा था?याद आया, वो वागार्थ मंच।मंच पर प्रगाढ़ प्रबुद्ध स्वयं सिद्ध हिन्दी साहित्यकार मंचासीन थे, पीछे एक बैनर लगा था विशुद्ध अंग्रेज़ी में " BLF VAGARTH आदि आदि और इस ढिठाई पर हिन्दी मंच पर कराह रही थी।
काले अंग्रेज़ो के कालोनी कंट्री में हिन्दी का दुःख 'जाये तो जायें कहां समझेगा कौन यहां। साहब विश्व हिंदी दिवस से पहले ज़रूरी है गृह हिन्दी दिवस, यानी फिर मुहल्ला हिन्दी दिवस नगर हिन्दी दिवस।
भाई साहब हम यूं तो अंग्रेज़ो के ज़माने की औलाद हैं पर पैदा हुए भोपाल के एक बा-बू-जी के घर में। चलो लगे हाथों आपको बाबूजी का मतलब भी बताते चलें। बा का मतलब उर्दू में 'साथ' हिन्दुस्तानी अंग्रेज़ो के लिये 'ब' मींन्स 'विथ', 'बू' का मतलब 'गंध' आई मीन 'फ्रेगरेंस'। अब युं न कहिए 'ख़ुशबूदार' या 'बदबूदार'। शाब्दिक अर्थों पर मत जाइये इसका भावार्थ या इम्प्लाइड मीनिंग हुआ 'बू'=इज्जत यानी बाबूजी=इज्ज़तदार आदमी। हां तो मुद्दे पर वापस आते हैं विश्व हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित इस कार्यक्रम पर। भाषा प्रूफ में भी हिन्दी के साथ दुआभाती स्पष्ट दिख रही थी। प्रसिद्ध हरदिल अज़ीज़ दुष्यंत जी का नाम भी चिपकाया हुआ था अंग्रेज़ी में । पता नहीं उनकी आत्मा की कचोट ने भी इन बेदर्दीयों को छुआ या नहीं पर हां हिन्दी के बजाय हिंग्लिश का वर्चस्व बेदख़ल था। हमने अपनी जेब से अपने आंसू पोंछने को रूमाल निकाला, अच्छा लगा वह हिन्दी के आंसुओं से यूं ही नम था।
- कर्नल डा गिरिजेश सक्सेना
भोपाल
.jpg)
