काव्य :
हिम-सी संवेदना
हिम-सी हो गई संवेदना
शहर की बंद खिड़कियों में
पड़ोसी हमारा
नाम तक भूल जाते हैं।
दिल की बातें मिल बांट
ऊष्मा बिखेरें,
चलो, अब गांव में
अलाव जलाते हैं।
हमारे देश पर सूरज
प्रति दिन निकलता है
ध्रुवीय देश जाने कैसे
बर्फ में रह पाते हैं!
-डाॅ. सुधा कुमारी
नई दिल्ली
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