ad

काव्य : आकर्षण - विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल


 काव्य : 

आकर्षण

(न्यूयॉर्क में, बर्फ से घिरे हुए, शब्दों के अंडों को सेते हुए यह छायावादी रचना )


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


बर्फ की चादर तले, 

मौन है सारा चमन,

खोजते हैं नयन अब, 

एक अपना सा सपन।


नग्न हैं सब डालियाँ, 

पर्णहीन, निस्पंद सी,

चेतना भी जम रही है 

हिम-परत में मंद सी।


खग नहीं आकाश में 

स्वर हुए सब गुमशुदा,

प्रकृति भी चुप मौन है, 

जैसे स्वयं से हो जुदा।


दूरियाँ ही तो यहाँ, 

प्राणों में भरतीं पीर हैं,

सब सुलभ सम्मुख खड़ा, 

पर निरा बेपीर है।


शब्द-मोती हम पिरोते, 

इस विजन एकांत में,

ढूँढते हम सत्य को, 

मिथ्या जगत के भ्रांत में।


उघड़े हुए इस सत्य से, 

अब मोह सारा जा रहा,

बर्फ का वह श्वेत जादू, 

कौतुक सारा जा रहा।


सौंदर्य का है रहस्य सारा 

घूँघटों की ओट में,

आज नग्न प्रकाश में, वह 

दृष्टि को क्यों रौंधती?


नयनो की भंगिमा में, 

छिपा जो इक राज था,

फासलों के खेल में ही, 

रति का सारा साज था।


पास आकर लौट जाना, 

स्पर्श दे के छिटक जाना,

प्यास जीवित ही रहे, 

और प्यार में हो भटकना।


पूर्ण जो मिल जाए तो, 

फिर मोह का बंधन कहाँ? 

बाधा जहाँ है शेष, बस 

आकर्षणों का मन वहाँ। 


मन विकल था करने हासिल

अज्ञात को हम पा सकें,

उघड़े हुए से ऊब है अब ,

चाह की विगत अपना सकें।


लौटेगा फिर युग वही, 

संकोच और ओट का,

उतरे नशा फिर, देह की 

उन्मुक्तता की चोट का।


स्वप्न फिर बुनने लगेंगे, 

अनछुई रेशम कथा,

प्राण फिर खोने लगेंगे, 

मौसमी मलयज यथा।


बर्फ पिघलेगी, हटेगा 

कफ़न सा यह श्वेत पट,

नवल पल्लव संग प्रकृति, 

फिर रचेगी रूप नटखट


- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post