अखिलभारतीय कलामन्दिर संस्था की वसन्त काव्य ग़ोष्ठी सम्पन्न : वरिष्ठ साहित्यकार सम्मानित
भोपाल । विश्व संवाद केंद्र शिवाजी नगर भोपाल के हाल में अखिल भारतीय कलामन्दिर संस्था की वसन्त काव्य ग़ोष्ठी वरिष्ठ साहित्य कारों एवं सामाजिक पुरोधाओं के सम्मान के साथ सम्पन्न हुयी। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’ जी ने करते हुए स्वागत उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकारों के सम्मान एवं कलामन्दिर की प्रगति से अवगत कराया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री राजीव अग्निहोत्री वरिष्ठ पत्रकार पीपुल्स समाचार ने अपने उद्बोधन में भोपाल की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत प्रकाश डाला और कलामन्दिर के इस साहित्यिक आयोजन की सुन्दर समीक्षा की तथा साहित्यकार पार्क हेतु किये गए प्रयासों हेतु डॉ गौरीश की प्रसंशा की।
विशिष्ट अतिथि डॉ साधना बलवटे निदेशक निराला सृजन पीठ ने अपने उद्बोधन में वसन्त के विभिन्न प्रकृति रंगों पर प्रकाश डालते हुए सुन्दर छान्दसिक गीत से सभी को मुग्ध किया।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री देवीसरन जी पूर्व कमिश्नर नगर निगम, एवं श्री घनश्याम सक्सेना जी के साथ श्रीमती सुधा दुबे, एवं श्री अभिषेक जैन अबोध का उनके साहित्यिक अवदान एवं संस्था को दिए विशेष सहयोग हेतु शाल, माला, श्रीफल, पुस्तक, मोनुमेंट देकर सम्मानित किया गया। पश्चात वसन्त विषयक काव्य ग़ोष्ठी में आमंत्रित रचनाकारों द्वारा उत्कृष्ट रचनाओं का पाठ किया। डॉ सुनीता शर्मा ‘सिद्धि ने सस्वर सरस्वती वन्दना के साथ एक गीत ‘ऐसी सुहानी वसन्त ऋतु आयी, आओ चलें साथी हम करें अगुआई। ’ इसके उपरांत ‘भार फूलों का भी अब कैसे सहे।
कसमसाता मन किसी से क्या कहे।।’
-अरविंद प्रियदर्शी
केशो का गजराए नयनों का कजरा थे।
मौसम मधुमास हुआ उपवन मन ठहराये।।
-प्रदीप मणि तिवारी ध्रुव भोपाली
मादक मलय पवन है चंदन महक सुहानी।
वसुधा पहन चहकती, चुनरी वसंत धानी।।
-डॉ कमल किशोर दुबे
ऋतु वसंत में देखिये, हरियाली चहु ओर।
साड़ी पहने है धरा, छवि हुई भाव विभोर।।
- डॉ शिव कुमार दीवान
माघ माह सूरज तपे, पुरवाई के संग।
कुछ गरम लगे, कुछ नरम लगे, झूमे अंग प्रत्यंग।।
- राम मोहन चौकसे पत्रकार
जीवन की रंगीन इन वादियों में जब से मेरे पास तुम आ गये हो।
मन मेरा जैसे बसंती हुआ है, फागुन के रंगों में तुम छा गये हो।
-कमल सिंह ' कमल '
लो बसंत आ गया
कोयले कुहुक उठी।
- सुधा दुबे
सी इन्हीं की मेज पर है फागुनी महफिल सजी।
ऑफिस गुलाबी फाइलों में आशिकी खिलकर जगी।।
-लक्ष्मीकांत जवडे अलख
मेरी आकांक्षाउनका सौंदर्य, यौवन
सदैव देदीप्यमान और अक्षुण्ण रहे।
-विपिन बिहारी बाजपेयी
सृष्टि का श्रृंगार मन नाचा हुलासों में।
खिल गये फिर फूल लो देखों पलासों में।।
- गोकुल सोनी
कला मंदिर की गोष्ठी, रस बरसे रसधार,
गौरिश की तोप चले, हरिवल्लभ भरमार।
- सुरेश पटवा
फाग मनाये होरी गाये।
भींगे चुनरियाँ उड़ उड़ जाये।।
- आदित्य हरि गुप्ता सीहोर
पर्वतों पर खो गये जब कायदे घर द्वार के।
हादसों की श्रृंखला फिर देखिए थमती कहाँ।।
-नीता सक्सेना
सारा जग डूबा है दुख में
गले गले तक गहरे।
-सीमा हरि शर्मा
पुष्पों के पुष्पक पर चढ़
ऋतु वसंत अब आया है।
कर सोलह श्रृंगार धरा ने
सबका मन हर्षाया है।।
-सरोज लता सोनी
लो बसंत ऋतु आ गई,
लो बसंत ऋतु छा गई।
-बिहारी लाल सोनी 'अनुज'
कुंवर जी उठिए कहत गुलाब।
-डॉ प्रमोद पुष्कर
ऋतु वसंत का आगमन, सुरभित हुई बयार।
खेतों में सरसों खिली, आम्र बौर भरमार।।
-अभिषेक जैन 'अबोध'
लौट आओ मित्र बसंत धरती मां तुम्हारा इंतजार में है -अरविंद मिश्र
भय नहीं है जन्म मृत्यु में आदि अंत का, बस चिर बसंत हृदय बसा रहा आकाश अमृत सा।
-डॉ वीणा सिन्हा
आ गए आ गए बसंत रितु राज हो।
चौक पूरे टेसू अमलतास हो ।
-डॉक्टर वंदना मिश्रा
श्री हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’ एक ग़ज़ल
ज़मीं को सब्ज करे कौन मेहरबाँ आकर।
बिखेरता है कई रंग बागवां आकर।
के बाद संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ गौरीशंकर शर्मा गौरी ने संस्था की गतिविधियों एवं बसंत के महत्व का वर्णन करते हुए अपनी रचना ‘बस अंत बस अंत जा तो, कहें वेद पुराण। एक शारदा ही ये कहे, जीवन बसंत प्रमाण।सुनाकर कार्यक्रम को ऊंचाई दी
कार्यक्रम का शानदार सफल संचालन डॉ वन्दना मिश्र ने किया।
और अंत में आभार कार्यकारी अध्यक्ष श्री हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’ ने आभार प्रदर्शित किया।
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