काव्य :
धरती का कृपालु मन
रेखाएं,लकीरें खींच खींच,
चित्र जैसे,बनाते हैं किसान
खेतों में, बीज यों रोपते
और, हल चलाते है किसान
पठारी,पहाड़ी जमीं को
कर देते हैं वे समतल
उनके श्रम और हल में,
होता, भूख मिटाने का, हल
पसीना बहाते,मुस्कुराते हुए
जिए जाते हैं,जीवन
प्रकृति परोस देती है उन्हें
जल,भोजन और अन्न
कवि ब्रज, बैठकर,देखा करता है
भूमि और मिट्टी की उदारता,
हरी फसलें ,सजा करतीं खेतो में
धरती का कृपालु मन व सुंदरता
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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