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एक मुलाकात फूलों के साथ - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम


 

एक मुलाकात फूलों के साथ....... 

 - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम

सुबह की धूप अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। ओस की हल्की-सी ठंडक हवा में तैर रही थी । कोहरे की चादर धीरे-धीरे सिमट रही थी साथ ही साथ भोपाल के शासकीय उद्यान में लगी फूलों की खूबसूरत प्रदर्शनी में रंग बिरंगे फूल अंगड़ाई लेते हुए कोई धीमा गीत गुनगुनाने में लगे हुए थे । उनकी पंखुड़ियाँ स्थिर नहीं थीं—वे हिल रही थीं, जैसे किसी अदृश्य ताल पर जीवन का स्पंदन थिरक रहा हो। लाल, पीले, नीले और बैंगनी रंग केवल रंग नहीं थे; वे समय की हथेलियों पर उकेरी गई अनुभूतियाँ थे, जिनमें जन्म, संघर्ष ,आशा और पुनः खिल उठने की कहानी छुपी हुई थी।

उन फूलों के बीच चलते हुए मुझे लगा, जैसे मैं किसी सपनों के परिलोक में प्रवेश कर गई हूँ—जहाँ हर पंखुड़ी एक वाक्य है और हर खुशबू एक भाव। गुलाब की महक में प्रेम का धैर्य था, शेवंती की सादगी में स्त्री-मन की कोमल दृढ़ता, और गेंदा , डेहलिया , जरबेरा अपनी तीखी सुगंध में लोक-संस्कृति की जीवटता समेटे खड़े थे। ये फूल केवल सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं कर रहे थे; वे जीवन के दर्शन को बिना शब्दों के समझा रहे थे।  

गुलाब, जरबेरा, डेहलिया, गेंदा, सेवंती, रजनीगंधा, ग्लेडियोलस, लिली, एंथुरियम, कारनेशन, और बोगनवेलिया जैसे प्रमुख खूबसूरत रंगों के साथ फूल आकर्षण का केंद्र बने हुए थे । इसके अलावा, विदेशी प्रजातियों के साथ-साथ मौसमी फूल जैसे जीनिया, पैंजी, फ्लॉक्स, और एस्टर अपनी - अपनी पृष्ठभूमि के साथ उपस्थित थे।

इन पुष्पों की यह सूची मात्र वनस्पति विवरण नहीं है, बल्कि समय, स्मृति और सौंदर्य के बीच रचा गया एक जीवंत संवाद है। जैसे उपन्यास के पन्नों पर पात्र धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, वैसे ही ये फूल अपने-अपने स्वभाव, रंग और गंध के साथ दृश्य में प्रवेश करते हैं—और फिर चुपचाप मन में बस जाते हैं।

गुलाब पूरे शबाब पर था— पूरे परिसर में इठला रहा था,मानो शरद ऋतु ने अपनी सबसे अनमोल कोमल मुस्कान उसी की पंखुड़ियों में सहेज दी हो। इंद्रधनुषी रंगों की आभा उसके भीतर ऐसे घुली थी, जैसे प्रकाश स्वयं फूल बनकर धरती पर उतर आया हो। लाल में आवेग था, गुलाबी में संकोच, पीले में उजास और सफ़ेद में मौन की गरिमा—हर रंग अपनी अलग कथा कहता, फिर भी सब मिलकर एक ही भाव रचते।

जरबेरा और डेहलिया अपनी चौड़ी मुस्कान-सी पंखुड़ियों के साथ आधुनिकता का संकेत देता है; वह उस वर्तमान का फूल है जो हर मौसम में उत्सव खोज लेता है। गेंदा, पीढ़ियों से आस्थाओं और लोकाचार में रचा-बसा, कथा में परंपरा का स्थायी स्वर बनकर उभरता है—मंदिरों की सीढ़ियों, आँगन और उत्सवों की थालियों में उसकी उपस्थिति स्मृति को सहज ही जगा देती है। शेवंती और कारनेशन, अपने संयत सौंदर्य के साथ, मध्यांतर की तरह हैं—न अधिक मुखर, न पूर्ण मौन—बस कथा को संतुलन देते हुए।

रजनीगंधा का प्रवेश होते ही वातावरण बदल जाता है। उसकी सुगंध रात की तरह गहन और आत्मीय है, मानो कोई पात्र जो कम बोलता है पर देर तक याद रहता है। ग्लेडियोलस और लिली ऊँचाई और गरिमा के प्रतीक हैं—वे जीवन के उपन्यास में आकांक्षा और स्वप्न के स्तंभ हैं, जो पाठक की दृष्टि को ऊपर उठाते हैं। एंथुरियम अपने चमकदार, लगभग शिल्प-सरीखे रूप में विदेशीपन और वैश्विक संवाद का संकेत देता है, जबकि बोगनवेलिया—बिना किसी औपचारिक आमंत्रण के—दीवारों और रास्तों पर फैलकर जीवन की जिद और रंगीन सहजता को रेखांकित करता है।

मौसमी फूल—जीनिया, पैंजी, फ्लॉक्स और एस्टर—जीवन कथा के वे क्षण हैं जो क्षणभंगुर होकर भी अर्थपूर्ण हैं। वे बताते हैं कि सौंदर्य का मूल्य उसकी स्थायित्व में नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति की तीव्रता में है। विदेशी प्रजातियाँ और देसी फूल साथ-साथ खड़े होकर एक सांस्कृतिक सहअस्तित्व रचते हैं—जहाँ परंपरा और आधुनिकता, स्थानीयता और वैश्विकता, एक-दूसरे को नकारते नहीं बल्कि समृद्ध करते हैं।

इस स्वप्न लोक परिदृश्य में फूल केवल दृश्य सजावट नहीं, बल्कि भावनात्मक संकेतक हैं। वे मनुष्य के भीतर छिपे ऋतुओं को उजागर करते हैं—कभी उल्लास, कभी विरक्ति, कभी स्मृति का कोमल स्पर्श। यही कारण है कि यह पुष्प-विन्यास एक बाग़ नहीं, बल्कि एक चलती हुई कथा बन जाता है—जिसमें हर रंग एक भाव है, हर सुगंध एक वाक्य, और हर खिलना जीवन की अनकही कहानी है।

सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी वहीं आकर ठहर गईं। पूजा की थाली में सजे वही फूल, विवाह के मंडप में गूँथी गई वही मालाएँ, और अंतिम विदाई में बिखराई गई वही पंखुड़ियाँ—जीवन के हर संस्कार में इनकी उपस्थिति अनिवार्य रही है। शायद इसलिए इनकी खुशबू में पूरा संसार महकता है, क्योंकि इसमें मनुष्य के सुख-दुःख, उसकी आस्थाएँ और उसकी अस्थिरता सभी समाहित हैं।

मैंने एक फूल को हल्के से छुआ। वह मौन था, फिर भी बहुत कुछ कह रहा था। मानो कह रहा हो—जीवन भी ऐसा ही है, क्षणिक, रंगीन और सुगंधित। अगर इसे महसूस कर लिया जाए, तो हर दिन एक उत्सव बन सकता है। और तभी समझ में आया कि ये फूल गुनगुना क्यों रहे हैं—वे हमें याद दिला रहे हैं कि जीवन केवल जीने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि महसूस करने की कला है।

डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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