काव्य :
हिसाब
कुछ उम्मीदें,कुछ ख्वाब
कुछ कर्मों का हिसाब
लिए बैठे हैं
ताना-बाना जिंदगी
का बुनने बैठे हैं,
कुछ तो लेखे
किस्मत ने लिखे
कुछ अपने किये को
आंकने बैठे हैं।
बीत गई सो बात
गई
गर स्वीकार लेते
तो जिंदगी के
ये झमेले न होते
हम तो बीती बातों का
हिसाब लगाने
बैठे हैं,
बिताए हैं कई पल
हमने रातों के साथ
जागकर
कई बिताए दिन के
साथ चलकर
सभी का लेखा करने
बैठे हैं।
पिघलती शमा-सी
पिघली साँसों की
गलन आँकने
बैठे हैं,
ढलती रात के साथ-साथ
ढल रही कितनी उमर
नापने बैठे हैं,
उम्र के बीच पढ़ाव में
ईश्वरीय लेखे को
थोड़ा मोड़ देने की ठान
हौंसलों की उड़ान
लिखने बैठे हैं।
- डा.नीलम,अजमेर
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