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खिल्लियों का मुहल्ला - सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ


 

 खिल्लियों का मुहल्ला 

सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ

न जाने कैसे, यकायक दायरे से बाहर निकल पड़ी थी मैं—

यह जानते हुए भी कि वह एक अवर्जित क्षेत्र है।

क़दम अपने आप चल पड़े थे उस सुकून भरे माहौल से दूर,

जल्दबाज़ी में अजीब-सी मृगतृष्णा ओढ़े…!!

अजीब-सा मुहल्ला था—मरघट-सा सन्नाटा।

अधखुले दरवाज़े, और ध्यान से देखने पर

कुछ सांवले-से चेहरे—

घूँघट की ओट से झाँकती मंद मुस्कानें।

समझ नहीं पाई थी मैं, पर उत्सुकता बढ़ चली थी।

चंद क़दम आगे बढ़ी ही थी कि एक बोर्ड दिखा।

ध्यान से पढ़ा तो लिखा था—

“खिल्लियों का मुहल्ला”

प्रश्नचिह्न लिए आगे बढ़ी ही थी कि

किसी बुज़ुर्ग के खँखारने की आवाज़ सुनाई दी।

टूटी-फूटी, रंगहीन गुमटी में एक बुज़ुर्ग बैठा था।

कुछ पूछती, उससे पहले ही

धीमी आवाज़ में बोला—

“किसे ढूँढ रही हो?

यहाँ की तो नहीं लगती…

सुनो न, मैं अट्टहास हूँ।

मेरा मतलब जानती हो न?

मुझे मख़ौल, खिल्ली के नाम से भी जाना जाता है।

मेरे ही नाम पर इस मुहल्ले का नामकरण हुआ है।”

मैं बोली—

“जी, आपने वाज़िब फ़रमाया।

मैं भटक गई हूँ… बाहर जाने का मार्ग ढूँढ रही हूँ।”

कराहती आवाज़ में अट्टहास बोला—

“अपनी मुस्कानों की दुनिया छोड़कर आना

तुम्हारा सही फ़ैसला नहीं था।

पर जब यहाँ आ ही गई हो तो

हमारे मुहल्ले के बारे में जान लो…”

“जाओ, आगे बढ़ो।

तुम्हें बूढ़ी दादी मिलेंगी—

हो सके तो उनसे कुछ सीख लेना।”

थोड़ी दूरी पर जर्जर साड़ी में

एक कमज़ोर-सी स्त्री

निस्तेज हँसी के साथ बुदबुदा रही थी।

नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ने ही वाली थी कि बोली—

“मुझसे मिले बिना ही जा रही हो?

अट्टहास दादा ने मेरा ज़िक्र किया था न?”

“सुनो, मेरा नाम मर्यादा है।

मैं भी जानते-बूझते इस अवर्जित क्षेत्र में आ गई थी,

तब से यहीं हूँ।”

“कभी भी, भूल से भी

अपने क़दम अलग राह पर मत ले जाना।

एक ग़लत क़दम

भटकाव को ज़िंदगी का हिस्सा बना देता है—

जो ताउम्र चैन छीन लेता है।

संभलकर चलना…

आगे आग है।

निश्चित परिधि से बाहर मत बढ़ना।”

आगे बढ़ी तो हल्की-सी तपिश महसूस हुई।

एक अजीब-सी दुर्गंध भी—असहनीय।

एक झुलसी-सी काया दिखी।

“रुको… पहचान लिया न?

दिमाग़ पर ज़ोर मत डालो—

मैं काया ही हूँ।

मोह मुझे यहाँ खींच लाया।

गर्व में इतनी उलझी कि

अपनी ही आग में झुलस गई।”

“इस काया का इस्तेमाल सोच-समझकर करना।

आगे बढ़ो…

और भी लोग मिलेंगे।

घबराओ नहीं।”

आगे बढ़ी…

चंद फासले पर तीन कमज़ोर, उग्र युवा मिले।

“कौन हो आप लोग?” मैंने पूछा।

वे एक साथ बोले—

“अरे मूर्ख स्त्री!

हमें नहीं पहचाना?”

“मैं द्वेष हूँ,”

दूसरा बोला— “मैं अहम,”

तीसरा— “और मैं स्वार्थ।”

मैं ज़ोर से हँस पड़ी—

(मरणासन्न स्थिति में भी)।

उनका स्वभाव अब भी वैसा ही था।

तीनों एक साथ बोले—

“हम पर हँस सकती हो!

एक समय था जब लोग हम पर हँसते थे,

और आज देखो—

हम इसी अवर्जित क्षेत्र में

औंधे मुँह पड़े हैं।”

“हमसे दूरी बनाए रखना।”

“वैसे भी तुम काफ़ी अंदर आ चुकी हो।

आगे बढ़ो—

कुछ और लोग मिलेंगे।”

आगे बढ़ी तो लगा

समय थम-सा गया है।

तभी एक बुलंद आवाज़ गूँजी।

चौंक गई मैं।

हरे-भरे विशाल वृक्ष के नीचे

श्वेत पगड़ी बाँधे

एक बुज़ुर्ग बैठे थे।

चेहरे पर गंभीरता,

आँखों में संतोष,

माथे पर झुर्रियाँ

और होंठों पर परिपक्व मुस्कान।

बोले—

“डरो मत। निस्संकोच चली आओ।”

“मेरा नाम अनुभव है।

मैंने जानबूझकर

इस मुहल्ले में आख़िरी मकान लिया है।”

“जानती हो क्यों?

ताकि भूले-भटके राहगीरों को

उनका उचित स्थान दिखाकर

उन्हें उनकी सही मंज़िल की ओर लौटा सकूँ।”

“मनुष्य के जीवन में कई मोड़ आते हैं—

अच्छे भी, बुरे भी।

बुरे से हारना नहीं,

उनसे सीखना है।

और अच्छे को पथप्रदर्शक मानकर

आगे बढ़ते रहना है।”

“जो नहीं सुनते,

वे इसी अवर्जित क्षेत्र में

क़ैद हो जाते हैं।

दोष किसी और को नहीं देना चाहिए।”

“मैं मासूम मुस्कानों

और मर्यादाओं को

उनके घर सकुशल लौटाने का प्रयास करता हूँ…

अनुभव आगे बात जारी रखते हुए बोले—

“पता है, आज भी कुछ आवारा हवाएँ

इस मुहल्ले से बाहर निकल जाती हैं।

मैं उन्हें रोकने की कोशिश करता हूँ,

पर वे अब मेरे हाथ नहीं आतीं।

मैं कमज़ोर हो चला हूँ—

पहले जैसा बलशाली नहीं रहा।

इस मुहल्ले की युवा पीढ़ी

मोह, लालच और अपराध में उलझी हुई है।

देखो न—

मैं चाहकर भी उन पर रोक नहीं लगा सका।

ये मासूम श्रृंगार को बहकाकर

यहाँ ले आते हैं—

कभी छल से, कभी अपहरण से।

इस मुहल्ले का सन्नाटा

सबको क़ैद कर लेता है।

यहाँ सिसकियों के सिवा कुछ नहीं—

बेइंतहा दर्द है।

जली हुई मोहब्बतों की लाशें हैं,

और एक चिरकालिक इंतज़ार—

जिसकी कोई सुबह नहीं।”

उन्होंने मुझे देखा और कहा—

“अब जाओ।

सशक्त बनो।

और भूलकर भी

इस अवर्जित क्षेत्र की ओर मत आना।

यहाँ कोई प्रहरी नहीं—

प्रवेश आसान है,

पर वापसी नहीं।”

“आगे बढ़ो।

एक बंदा मिलेगा

जो तुम्हें सलामत

तुम्हारे गंतव्य तक पहुँचा देगा।

शुभकामनाएँ…”

धीमे क़दमों से आगे बढ़ी।

हल्क सूखने लगा था,

दिल की धड़कनें तेज़ हो चली थीं।

घर की याद सताने लगी थी।

तभी तेज़ चकाचौंध हुई—

आँखें चौंधिया गईं।

ठहरने का अवसर भी नहीं मिला।

एक प्रकाशपुंज ने

मुझे तेज़ी से अपनी ओर खींच लिया।

वह बोला—

“बहुत सही समय पर

तुम मुहल्ले से निकली हो।

मुबारक़ हो तुम्हें।

घबराओ मत—

तुम अब सलामत हो।

शायद तुमने मुझे पहचाना नहीं।

सच है—

लोग मुझे जल्दी समझ नहीं पाते।”

“मैं समय हूँ।”

“मैं अक्सर इस गोधूलि में

यहाँ से निकलता हूँ—

दहलीज़ पार करती उम्र को लेने।

कभी समय पर कोई मिल जाए तो ठीक,

वरना अक्सर

मैं भी यहाँ भटक जाता हूँ—

अवर्जित होकर।”

“जो मुझे खो देता है,

वह ज़िंदगी भर

पश्चाताप ही करता रह जाता है।”

उसने हाथ बढ़ाया—

“चलो सखी,

मेरा हाथ थाम लो—

ताउम्र के लिए।

मैं तुम्हें

तुम्हारी मुस्कानों के घरौंदे तक

ख़ुद छोड़ आऊँगा।”

बिना सोचे

मैं झट से उससे आलिंगनबद्ध हो गई।

दृढ़ निगाहों से

अवर्जित क्षेत्र से विदा ली—

कभी न लौटने के लिए।

समय बोला—

“तुम्हारे अपने

कब से परेशान हैं।

जाओ—

एक उम्र

तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है।

उस दूर खड़ी

ख़ुशी को देखो—

जो बेसब्री से

तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

“जाते-जाते एक बात याद रखना—

जो तुम्हारे आँसुओं की फ़िक्र न करे,

उसे इसी अवर्जित क्षेत्र में छोड़ देना।

और जो तुम्हारे आँसू

ज़मीन पर गिरने से पहले थाम ले—

उसे कभी

अलविदा मत कहना।”

“अब भूलकर भी

इस ओर मत बढ़ना।”

“जाओ—

एक सशक्त पुंज बनकर

दुनिया के सामने आओ, सखी।

मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ—

मज़बूती से थामे हुए।”

घर आ गई हूँ।

सकुशल।

बिंदास।

सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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