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भाषा विचार : अमीर ख़ुसरो – हिंदुस्तान की तूती - द्वारा – डॉ.लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)


 

आलेख -भाषा विचार : 

अमीर ख़ुसरो – हिंदुस्तान की तूती


द्वारा – डॉ.लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)


        हिंदुस्तानी भाषाओं का अभिमान अपनी रचनाओं से अभिव्यक्त करनेवाले अमीर ख़ुसरो (1254- 1324, हिजरी 652-  725) आज भी हमें प्रभावित क्यों करते हैं? इस बात पर आज भी सचमुच विचार करने की जरूरत है।

आज के दौर में हमारे काफ़ी बच्चों की नज़र योरोपियन, मिडिल ईस्ट की नौकरियों पर टिकी हुई है। इस बात को तो हम बुरा भी नहीं मानते हैं। लेकिन हमें भारतीय भाषाओं से दूर करनेवाली आजकी शिक्षापद्धति के प्रति चिंता होती है। वैसे तो योरोपीय भाषाएं अलग से भी सीखी जा सकती है। शिशु वर्ग से ही मातृभाषा का उच्चाटन करने की स्थिति  आज के समय की गंभीर समस्या बनी है। इसलिए हमें अमीर ख़ुसरो आज भी याद आते हैं। 

अमीर ख़ुसरो के समय फ़ारसी ही राजभाषा थी। लेकिन ख़ुसरो का व्यक्तित्व और कवित्व संपूर्ण हिंदुस्तानी रंगों में रंगा था।अमीर ख़ुसरो 20 साल की उम्र में ही अपने  कवित्व से खूब शोहरत हासिल कर चुके थे। आगे चलकर इस कवित्व के बल पर ही उनको अंतिम समय तक दिल्ली के सभी बदलते  शासकों का  राजाश्रय भी मिला था। 

जिसमें महत्वपूर्ण थे जलालुद्दीन ख़िलजी जिन्होंने अपने दरबार में सम्मान करते हुए उनको ‘अमीर’ पदवी दी थी।मूलतः इनका मूल नाम ‘अबुल हसन’था। ख़ुसरो उपनाम था। आगे चलकर अमीर ख़ुसरो ही प्रचलित हो गया और उनका मूल नाम पीछे हट गया। 1296 में अल्लाउद्दीन  अपनी धूर्तता से दिल्ली की तख़्त पर आसीन हुए। वहाँ भी ख़ुसरो को इनके दरबार में ‘ख़ुसरुए – शोअरा’ का सम्मान मिला था। आगे के उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन मुबारकशाह के दरबार में ख़ुसरो का वहीं स्थान रहा। इसके बाद ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के शासन  काल मे भी ख़ुसरो को अपने अंतिम दिनों तक राजाश्रय मिला था। अमीर ख़ुसरो का कवित्व, संगीत-प्रेम, शासकों के प्रति मधुर व्यवहार और ज्ञान ही इस सम्मान और राजाश्रय का कारण था। 

तो हिंदुस्तानी भाषाओं पर गर्व करनेवाले अमीर ख़ुसरो का यह राजाश्रित कवी जीवन और उनका लेखन आज भी उनकी व्यावहारिक चतुरता का महत्वपूर्ण उदाहरण दिखाई देता है।

ख़ुसरो को अपने हिंदुस्तान देश पर बहुत गर्व था। उनकी रचनाओं में इस बात का परिचय भी मिलता है। उनका यह लिखित जवाब काफी प्रसिद्ध है,

 “तुर्क हिंदुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब”

अर्थ – मैं हिंदुस्तानी तुर्क हूँ, हिंदवी में जवाब देता हूँ।

(पृ.15)

डॉ. भोलानाथ तिवारी ख़ुसरो को 'आधुनिक भारतीय भाषाओं के उल्लेखकर्ता' कहते हुए इस मुद्दे को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि, "ख़ुसरो ने हिंदवी का प्रयोग संस्कृत, प्राकृत आदि प्राचीन तथा आधुनिक सारी भारतीय भाषाएँ तथा 'हिंदी' इन सभी अर्थों में किया है।लगता है कि उस काल में यह शब्द काफ़ी व्यापक भी था।इसमें पूरी तरह अर्थ - संकोच नहीं आ गया था।आगे चलकर अर्थ-संकोच से ही 'हिंदवी' तथा 'हिंदी' शब्द अपने परवर्ती अर्थ में प्रयुक्त होने लगे।(पृ.51)

जबकि मुस्लिम शासकों का राजाश्रय और स्वयं ख़ुसरो भी इस्लाम को मानने वाले थे। ख़ुसरो के इस हिंदवी भाषा से आग्रहपूर्वक प्रेम को किसी ने उस समय न रोका न टोका। ना ही यह विषय कोई विवाद का मुद्दा भी बना था।

हमें इतिहास को गौर से समझने की जरूरत है। जिस देश में हमारा जन्म हुआ है। वहां की भाषाओं का संवर्धन देश की संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस बात को समझने के लिए इतिहास को तटस्थता से ही पढ़ना चाहिए।

ख़ुसरो की लिखी कुछ मजेदार पहेलियाँ देखिए :

1- एक कहानी मैं कहूँ,

तू सुन ले मेरे पूत। 

बिना परों वह उड़ गया,

बांध गले में सूत।।

                           (पतंग)

2- नारी काट के नर किया,

सब से रहे अकेला।

चलो सख़ी वाँ चल के देखे,

नर-नारी का मेला।।

                         (कुआँ)

   मूलतः संस्कृत काव्य में इस काव्य प्रकार को 'प्रहेलिका' कहते हैं। विशिष्ट वस्तुस्थिति का सत्य रूप छिपाकर चमत्कृती पूर्ण वाक्यरचना से उसकी रचना की जाती है। उसका भेद जानने के लिए सामने वाले को आव्हान किया जाता है। यह हमारे जन जीवन का सदियों से चलता आया बौद्धिक और रंजन करनेवाला मौखिक खेल है। हिंदी में इस शब्द का रूप 'पहेली' हो गया है। 

अमीर ख़ुसरो का दिल्ली प्रेम उनकी रचनाओं में खूब उतरा है। वैसे ही वह दिल्ली के सूफ़ी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया को अपना गुरु मानते थे। ऐसा भी कहा जाता है कि, हज़रत निजामुद्दीन औलिया ने उनको ख़िरका (विशेष वस्त्र) दिया था। जो एक सच्चे सूफ़ी की योग्यता बहाल करने के अनुरूप ही था।

गुरु- शिष्य का यह प्रेम भी दुनिया को हमेशा याद रहा। जो कुछ भी हुआ वह ऐसा ही था। गयासुद्दीन के साथ ख़ुसरो बंगाल के युद्ध में शामिल हुए थे। दरमियान  हज़रत निजामुद्दीन औलिया का देहांत हो गया।  अमीर ख़ुसरो बहुत ही दुःखी हो गए। उन्होंने बंगाल से आते ही काले कपड़ें पहनना शुरू कर दिया।वह अपने गुरु की समाधि के पास  जाकर बैठे रहा करते थे। जहाँ उनका रचा यह छंद भी लोकप्रिय है,


 “गोरी सेवे सेज पर मुख पर डारे केस।

चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस”


वह अपने गुरु का विरह सहन नहीं सकें। छह महीनों तक इस विरह - वेदना को सहकर 1324 (हिजरी -725)में उनकी मृत्यु हो गई। 

ख़ुसरो हिंदी, फ़ारसी, तुर्की, अरबी और संस्कृत भाषा के ज्ञानी थे। फ़ारसी में जो उनका विपुल लेखन है उसको भी संरक्षित किया गया है। अमीर ख़ुसरो गायक  तथा संगीत के ज्ञानी भी थे।संगीत के क्षेत्र में तीन तारों का ‘सेहतार’ (फारसी सेह=तीन+तार)जो आगे चलकर ‘सितार’ बना। आगे इस वाद्य मे और भी बदलाव किया गया है। ख़ुसरो  को ‘कव्वाली’ और ‘तराना’ का अविष्कारक भी माना जाता है।

आज हम तकनीकी युग में आधुनिक ज्ञान ग्रहण कर रहे हैं। हमें भारतीय भाषाओं से जुड़ी सच्चाइयों  को भी पढ़ना - समझना चाहिए।यदि हमें भारतीय भाषाओं द्वारा अपना विकास और विश्व में  हमारा स्थान विकसित करना है। तो आनेवाली पीढियों के लिए भारतीय भाषाओं को शिशु वर्ग से ही संरक्षित  करना चाहिए। इस विषय पर गंभीरता से सोचने की अब बेहद जरूरत  है। 


द्वारा - डॉ. लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)


संदर्भ ग्रंथ-

●अमीर ख़ुसरो और उनका हिंदी साहित्य- डॉ. भोलानाथ तिवारी, ( प्र.सं.2020,प्रभात पेपरबैक्स,दिल्ली.02)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. संपादक, श्री.देवेंद्र भाई सोनी जी,

    मेरा आलेख प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! 🙏

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