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वैवाहिक जीवन में समायोजन की समस्या व समाधान - डॉ मनोज कुमार तिवारी,वाराणसी


 

वैवाहिक जीवन में समायोजन की समस्या व समाधान


 - डॉ मनोज कुमार तिवारी 

वरिष्ठ परामर्शदाता 

एआरटीसी, मेडिसिन विभाग, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी


        अध्ययनों के अनुसार 22.6% महिलाएं और 20.70% पुरुष वैवाहिक समायोजन की समस्या का सामना करते हैं। दुखी वैवाहिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों में खुशहाल वैवाहिक जीवन जीने वालों की तुलना में ​​अवसाद से पीड़ित होने की संभावना 25 गुना अधिक होती है। 2-3 वर्ष में जोड़े एक-दूसरे को समझने लगते हैं और अपने जीवन स्थितियों को स्वीकार करने लगते हैं। जो लोग अपने दृष्टिकोण को बदल नहीं पाते या जीवन में बदलाव नहीं ला पाते, वे समायोजन की समस्या का सामना करते हैं। निराशा का दौर आने लगता है जब "सपनों का राजकुमार" अपनी चमक खो बैठता है या "प्रिय पत्नी" उम्मीदों पर खरी न उतरती है। समय की कमी, पैसे की समस्या, संतानोत्पत्ति  की समस्या,  यौन संबंध में तालमेल बिठाने की चुनौतियाँ समायोजन के लिए समस्या बनती हैं।

*सुखमय वैवाहिक जीवन के उपाय:-*

# जीवन साथी को अपने सबसे अच्छे दोस्त की तरह समझें।

# विवाह को एक दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के रूप में देखें।

# विवाह को एक पवित्र संस्था के रूप में देखें।

# लक्ष्यों पर आपसी सहमति बनाएं

# साथ में हँसें, एक दूसरे पर न हंसे।


*विवाह के बाद समायोजन की समस्याएँ:-*

*व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कमी:-* घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपने सपनों, कैरियर व व्यक्तिगत रुचियों के लिए समय कम मिलना विवाह के बाद आम बात है। जिम्मेदारियों बढने के साथ साथ स्वतंत्रता बाधित होती जाती है।

*पारिवारिक हस्तक्षेप:-* संयुक्त परिवार में सास-बहू के बीच तालमेल की कमी या निजी मामलों में परिजनों का हस्तक्षेप समायोजन की समस्या खडा करता है। मोबाइल के कारण आजकल वधू पक्ष के अत्यधिक हस्ताक्षेप के कारण भी दिक्कतें आ रहीं हैं।

*संवाद की कमी:-* परिवार के सदस्यों में आपसी बातचीत में कमी के कारण गलतफहमियांँ उत्पन्न होतीं हैं जो समायोजन को गडबड करतीं हैं। 

*विचारों में मतभेद:-* 

अलग-अलग विचारधाराओं के कारण आपसी तनाव व कलह उत्पन्न होता है ऐसी स्थिति दूसरे धर्म में शादी करने या अन्तर्जातीय विवाह में अधिक होता है।

*पति पत्नी का कामकाजी होना :-* कैरियर व घर (ससुराल) के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई के कारण समायोजन की समस्या आती है। दोनो के जाँब करने से अनेक समस्याएं आती हैं।

*आर्थिक चुनौतियाँ:-* एक का दूसरे पर आर्थिक रुप से निर्भर रहने पर न केवल आर्थिक बोझ एक व्यक्ति पर पडता बल्कि समायोजन भी प्रभावित होता है। 

*भावनात्मक:-*

भावनात्मक रूप से अलग थलग महसूस करने से भी वैवाहिक जीवन में समस्या खडी होती है।


*न करें:-*

*आलोचना करना:-*  आलोचना की शुरुआत शिकायत से होती है। जीवन साथी में ऐसी कई बातें होती हैं जो दूसरे को परेशान करती हैं। जो वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं पैदा करती हैं। आलोचना में व्यक्ति के व्यक्तित्व व चरित्र पर हमला किया जाता है।

*अवमानना करना:-* आलोचना अक्सर अवमानना ​​में बदलती है। जब साथी को अपमानित व मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के इरादा से होता तो इसके पीछे अक्सर साथी के बारे में बेहद नकारात्मक विचार होती हैं, जैसे कि वह कितना मूर्ख, घृणित, अक्षम है। ऐसे में एक-दूसरे के प्रति प्रेम दिखाना मुश्किल होता है जिससे समस्याएं घटने के वजाय बढती हैं।

*रक्षात्मकता अपनाना:-* अधिकांशत: अपमान की प्रतिक्रिया में रक्षात्मकता आती है। रक्षात्मकता में ज़िम्मेदारी से इनकार करना, बहाने बनाना, आलोचना को साथी पर थोपना, खुद शिकायत करना, साथी की शिकायत का जवाब शिकायत से देना। ये सभी व्यवहार साथी की शिकायत को समझने व व्यवहार को बदलने की कोशिश करने के विपरीत है। इससे समस्या कभी हल नहीं होती है।

*चुप्पी साधना:-* जब दंपत्ति अपनी समस्याओं के समाधान की ओर आगे नहीं बढ़ पाते हैं, तो अक्सर एक साथी बातचीत में चुप्पी साधना शुरू करता है। इसका मतलब है कि जब दूसरा साथी उन पर गुस्सा होता है, तो वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है जिससे समायोजन की समस्या बढती जाती है।

*समायोजन के उपाय:-*

*रुचि दिखाएं:-* यह जीवन साथी की आंखों में देखने जैसा व्यवहार भी हो सकता है। एक दूसरे के पसंद व नापसंद का ख्याल रखें तथा उसी के अनुसार व्यवहार करने का प्रयास करें।

*स्नेहपूर्ण रहें:-* यह छोटे-छोटे शारीरिक गतिविधियों व स्नेहपूर्ण कार्यों के माध्यम से दिखाया जा सकता है, अपने साथी को साथ बिताए किसी सुखद पल की याद दिलाकर भी किया जा सकता है।

*परवाह दिखाएं:-*

छोटी-छोटी विचारशीलता व दयालुता के कार्य किसी भी रिश्ते में बड़ा फर्क लाते हैं इसलिए अपने जीवन साथी की परवाह करने के साथ ही इसे दर्शाया जाना भी जरुरी है।

*कृतज्ञता व्यक्त करें:-* जब भी जीवन साथी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनके योगदान की सराहना करते हैं तो दोनों के बीच का बंधन और मजबूत होता है।

*चिंता व्यक्त करें:-* जब जीवन साथी दुख/ कठिनाई व्यक्त करता है तो यह महत्वपूर्ण है कि उसे यह महसूस कराया जाए कि उसकी चिंताओं को महत्व दिया जा रहा है।

*समानुभूति रखें:-* अपने जीवन साथी की भावनाओं को समझने की कोशिश करने से दोनों एक दूसरे की बात को समझ सकते हैं। इसे शब्दों या चेहरे के सरल हावभाव से व्यक्त किया जा सकता है। भले ही आप अपने साथी की बातों से सहमत न हों, फिर भी उन्हें यह बताना महत्वपूर्ण है कि आप उनका सम्मान करते हैं और उनकी भावनाओं को महत्व देते हैं।

*हंसी-मजाक करें:-* जीवन साथी के साथ हंसी-मजाक करने से रिश्ते मजबूत होते हैं व समस्याएं कम होतीं हैं।

*चिंता ही नहीं खुशी भी साझा करें:-* जिस तरह चिंता को साझा करना महत्वपूर्ण है, उसी तरह खुशी या अच्छे समय के बारे में अपने जीवन साथी को बताना भी सकारात्मक बदलाव के लिये आवश्यक है।

*घर की बात घर में ही रहे:-*

अपने घर की बात घर में ही रहे। एक परिवार की तरह रहना चाहिए। आजकल देखा जा रहा है कि नवागत बहू अपने ससुराल की हर छोटी बड़ी बात अपने मायके वालों से मोबाइल के माध्यम से साझा करती है जिससे समस्याएं बढ़ने की जोखिम बना रहता है।

*एक के क्रोधित होने पर दूसरा शांत रहें:-* जब जीवन साथी क्रोधित हो तो उसे समय दूसरे साथी को शांत रहना आवश्यक है क्योंकि जब व्यक्ति क्रोध में होता है तो उसके सोचने समझने की क्षमता बहुत कम होती है उससे उस समय तर्क करना उसके क्रोध को और बढ़ाता है जब वह शांत हो जाए तब अपनी बात शांति से रखना चाहिए।

*पोज़िटिव गुणों पर ध्यान दें:-*

जब हम दूसरों के साथ संपर्क में आते हैं तब उसके अच्छे व खराब गुणों पर ध्यान जाना स्वाभाविक है। ध्यान अच्छे गुणों के बजाय खराब गुणों पर अधिक जाता है। इसके लिए जीवन साथी के अच्छे गुणों की एक सूची बनानी चाहिए और जब कोई समस्या हो तो उस सूची को पढ़ना चाहिए। इससे विवाहित जीवन में सकरात्मक बदलाव आता है।

*सहें न समाधान करें :-*

वैवाहिक जीवन में सहन करने के बजाय समस्याओं के समाधान पर सोचना अच्छा होता है। सोचकर उसका हल निकालें। बहुत अधिक व लम्बे समय तक सहन करना समस्या को बढाता है।

*बदलाव करें:-*

पति-पत्नी दोनों निश्चय करें कि हमे बदलाव करना है तो समस्या का समाधान स्वतः हो जाऐगा। दोनों के अधिक खींचा-तानी करने से बात और बिगड़ेगी। व्यवहारों व विचारों में बदलाव ला कर समस्या को समाप्त किया जा सकता है। 

*क्लेश को खत्म करने की भावना रखें:-* आपस में झगड़ा होने पर हमेशा झगड़ा को खत्म करने के भाव के साथ व्यवहार करना चाहिए न कि बदले की भावना से व्यवहार करना चाहिए।

*एकता रखें:-*

जीवनसाथी के साथ एकता बनाए रखें। दम्पति के बीच मतभेद होना स्वभाविक है पति पत्नी आपस में तय करें कि मतभेद होने पर हम उसे मिलकर हल करेंगे। जब लगे कि मतभेद बढ़ रहे हैं, तो आपस में पहल करके बात करें मानो कुछ हुआ ही न हो।

*प्रभावी संवाद:-* साथी के साथ खुलकर बात करना व एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, मतभेदों को सुलझाने का सबसे कारगर तरीका है।

*पारस्परिक सम्मान व सहयोग:-* एक-दूसरे की रुचियों और निजता का सम्मान करना चाहिए न कि एक दूसरे पर शक करके पहरेदारी करना चाहिए।

*जिम्मेदारियों का बंटवारा:-* घर के कामों व जिम्मेदारियों में समानता और आपसी सहमति से काम को बाँटना चाहिए। सभी को एक दूसरे के सहयोग की भावना रखना चाहिए।

*धैर्य और समझदारी:-* नई जगह, नए लोगों और रीति-रिवाजों के अनुसार खुद को ढालने के लिए धैर्य व समझदारी से काम लेना चाहिए।

*परिवार का सहयोग:-* परिवार को नए सदस्य खास कर वधू की भावनाओं और उसके व्यक्तिगत विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।

*काउंसलिंग की सहायता:-* समस्याएं बहुत बढ़ जाएं तो मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता से मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। 

पारिवारिक एवं वैवाहिक जीवन न केवल विश्वास एवं सहयोग पर टिका होता है बल्कि सुखमय जीवन का आधार होता है। समस्यात्मक वैवाहिक जीवन न केवल पति-पत्नी को प्रभावित करता है बल्कि बच्चों के विकास को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है इसलिए यदि वैवाहिक जीवन में समस्याएं हो तो उसे प्राथमिकता के आधार पर समाधान करने का प्रयास नितांत आवश्यक है।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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