ad

पहचान की पड़ताल, प्रेम की परख—लव जिहाद पर गुजरात की पहल -प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


 

पहचान की पड़ताल, प्रेम की परख—लव जिहाद पर गुजरात की पहल

[प्रेम पर प्रश्न नहीं, पहचान पर जांच—गुजरात का नया मसौदा]

[गुजरात में प्रस्तावित बदलाव: लव जिहाद पर प्रहार या नई पेचीदगी?]


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


गुजरात में विवाह व्यवस्था को लेकर सियासी और सामाजिक हलकों में जबरदस्त हलचल मच गई है! 20 फरवरी 2026 को राज्य सरकार ने ‘लव जिहाद’ के नाम पर कथित ठगी और सांस्कृतिक आक्रमण पर रोक लगाने के उद्देश्य से मैरिज रजिस्ट्रेशन नियमों में बड़े बदलाव की घोषणा कर दी। डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष संघवी ने विधानसभा में स्पष्ट कहा कि बेटियों की गरिमा और सनातन परंपरा की सुरक्षा के लिए सख्त कानूनी कवच तैयार किया जाएगा। प्रस्तावित संशोधन फर्जी पहचान छिपाने वालों पर शिकंजा कसने का दावा करता है, वहीं प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के जीवन पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। क्या यह कदम ‘लव जिहाद’ जैसी प्रवृत्तियों पर निर्णायक प्रहार साबित होगा, या फिर नई कानूनी और सामाजिक जटिलताएँ खड़ी करेगा तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठाएगा? यही बहस आज पूरे देश में तेज़ हो चुकी है।

सिर्फ काग़ज़ी औपचारिकता नहीं, अब कड़ी जवाबदेही—सरकार ने गुजरात रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिजेस एक्ट 2006 के तहत नियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। स्पष्ट किया गया कि मौजूदा प्रावधानों के छिद्रों का दुरुपयोग हो रहा था। संशोधन के तहत अब हर मैरिज रजिस्ट्रेशन के लिए दुल्हन-दूल्हे को दो गवाहों के हस्ताक्षर सहित नोटराइज्ड आवेदन देना होगा। आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट, निमंत्रण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो, विवाह की फोटो और गवाहों की फोटो अनिवार्य होंगी। साथ ही, जोड़े को लिखित घोषणा देनी होगी कि उन्होंने माता-पिता को सूचना दी है या नहीं, तथा उनके नाम, पता, आधार नंबर, फोन नंबर और निवास प्रमाण पत्र भी जमा करने होंगे।

अब विवाह पंजीकरण केवल औपचारिकता नहीं, नियंत्रित प्रक्रिया बनेगा। नए नियमों के अनुसार, आवेदन मिलते ही असिस्टेंट रजिस्ट्रार 10 कार्य दिवस के भीतर दोनों पक्षों के माता-पिता को व्हाट्सएप, इलेक्ट्रॉनिक या भौतिक माध्यम से सूचना देगा। इसके बाद आवेदन जिला या तालुका रजिस्ट्रार को भेजा जाएगा और सभी शर्तें पूर्ण होने पर ही पंजीकरण स्वीकृत होगा। पूरी कार्यवाही नए ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड की जाएगी, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। सरकार ने 30 दिनों के भीतर आम जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं; स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की वेबसाइट पर प्राप्त फीडबैक के आधार पर अंतिम नियम अधिसूचित किए जाएंगे। इस परिवर्तन का सीधा और सबसे अधिक प्रभाव एलोपमेंट, यानी भागकर विवाह करने वाले जोड़ों पर पड़ेगा।

सख्त संदेश के साथ सरकार का दावा है कि ये बदलाव ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं को जड़ से समाप्त करेंगे। हर्ष संघवी ने कहा, “अगर कोई सलीम अपनी पहचान छिपाकर सुरेश बनकर राज्य की बेटियों को फंसाता है, तो सरकार ऐसी सजा देगी कि भविष्य में किसी बेटी की ओर कोई बुरी नजर डालने की हिम्मत नहीं करेगा।” उन्होंने पंचमहल का उदाहरण देते हुए कहा कि मुस्लिम आबादी न होने के बावजूद सैकड़ों निकाह प्रमाण पत्र जारी हुए; बनासकांठा, नवसारी और मेहसाणा में भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। संघवी ने इसे “सांस्कृतिक आक्रमण” करार देते हुए कहा कि असामाजिक तत्व पहचान छिपाकर बेटियों को निशाना बना रहे हैं। लगभग 30 सामाजिक संगठनों से चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया है।

सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया है कि उसका विरोध प्रेम विवाह से नहीं, बल्कि छल और दबाव से है। हर्ष संघवी ने कहा, “सरकार सच्चे प्रेम का सम्मान करती है, किंतु धोखाधड़ी और जबरन संबंधों पर कठोर कार्रवाई करेगी। यह सरकार हर बेटी की गरिमा और सनातन परंपरा की संरक्षक है।” नए नियम ठगी पर अंकुश लगाएंगे और परिवारों को पूर्व सूचना मिलने से विवादों को पहले ही सुलझाने का मौका मिलेगा। 30 दिन की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि जोड़ों को विवेकपूर्ण निर्णय का अवसर देगी तथा जाली दस्तावेजों की जांच सरल बनाएगी। इससे समाज में पारदर्शिता बढ़ेगी और बेटियों की सुरक्षा मजबूत होगी।

इन प्रस्तावों पर विपक्ष और विधि विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं। उनका तर्क है कि माता-पिता को अनिवार्य सूचना देने का प्रावधान अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाहों पर परोक्ष अंकुश लगा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इण्डिया के कई निर्णय— लक्ष्मीबाई चंदरगी बनाम कर्नाटक राज्य (2021), शफीन जहां बनाम असोकन के. एम. (2018) और लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006)—स्पष्ट करते हैं कि वयस्कों को जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है और परिवार या समाज की सहमति आवश्यक नहीं। संविधान का अनुच्छेद 21 निजी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करता है। दिल्ली और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी स्पेशल मैरिज एक्ट के नोटिस पीरियड को प्राइवेसी का उल्लंघन बताया था। ऐसे में यह प्रावधान संवैधानिक अधिकारों से टकरा सकता है।

इन नए प्रावधानों से गुजरात में विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है। जहां पहले त्वरित पंजीकरण संभव था, अब 30 दिन की अनिवार्य प्रतीक्षा करनी होगी। अंतरधार्मिक या भागकर विवाह करने वाले युवा-युवतियों के परिवार की नजर में आने का जोखिम बढ़ेगा। कई सामाजिक संगठनों का मत है कि इससे अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ सकता है और बेटियां दबाव में आ सकती हैं। वहीं समर्थकों का तर्क है कि इससे छलपूर्वक रचे गए प्रेम जाल से बचाव होगा और सामाजिक संरचना सुरक्षित रहेगी। 30 दिन के सार्वजनिक सुझावों के बाद ही अंतिम स्वरूप तय होगा, इसलिए अभी पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

कुल मिलाकर यह प्रस्ताव गुजरात की जटिल सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं का सशक्त प्रतिबिंब बनकर उभरा है। यदि इसे लागू किया गया, तो उन राज्यों के लिए उदाहरण बन सकता है जहां ‘लव जिहाद’ को लेकर लंबे समय से आशंकाएं और बहसें चलती रही हैं। बेटियों की सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के नाम पर उठाया गया यह कदम व्यवहार में कितना कारगर सिद्ध होगा, इसका अंतिम आकलन समय ही करेगा। फिलहाल इतना निश्चित है कि गुजरात में विवाह पंजीकरण अब केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं रहेगा, बल्कि परिवार, समाज और शासन—तीनों की प्रत्यक्ष निगरानी में होगा। यह बदलाव सामाजिक संतुलन को सुदृढ़ करेगा या नए विवादों और वैचारिक टकरावों को जन्म देगा, इसकी वास्तविक कसौटी अब आने वाला समय ही तय करेगा।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post