काव्य :
मैं! कमजोर नही
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मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।
सुशील हूं शालिन हूं,
पर सब पर भारी हूं।।
पलट कर देखो इतिहास,
हर युग में परचम लहराया।
लाज का घूंघट ओढ़कर,
आंचल में कल्पतरु खिलाया।।
बेमिसाल मेरी माया,
मैं! पावन हितकारी हूं।
मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।।
हर घर की शान हूं,
मानव तेरी पहचान हूं।
खिलौना समझने वालो,
वेद, ऋचाओं की बखान हूं।।
नदियों का कलनाद,
झरते झरनों की धूंआरी हूं।
मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।।
कवच हूं, मैं ही ढाल हूं,
मैं! चमकती तलवार हूं।
भीषण रणभेरी गर्जना,
विध्वंसक यलगार हूं।।
शक्ति से जन्मी ज्वाला,
शक्ति स्वरूपा अवतारी हूं।
मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।।
बहुत कुछ सहा मैंने,
अरमानों की बलि चढ़ा दी।
ओर कितना सहन करूं,
जालिमों ने बोली लगा दी।।
मैं! लाचार,नादान नही,
उसूलों पर सब वारी हूं।
मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।।
कहकर अबला मुझको,
जमीर मेरा तोला गया।
तुम कमजोर हो कोमल हो,
हर बार यही बोला गया।।
अग्रज हूं,समाज में,
सम्मान की अधिकारी हूं।
मैं! कमजोर नही,
राख में दबी चिंगारी हूं।।
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- दीपक चाकरे,चक्कर, , खंडवा
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