विकास की दिशा पर पुनर्विचार: क्या केवल जीडीपी पर्याप्त है?
[प्रकृति की कीमत पर प्रगति: क्या यह सौदा टिकाऊ है?]
[आर्थिक शिखर पर खड़ा समाज, भीतर से कितना सशक्त?]
• प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं, या आंकड़ों की चमक ने हमारी दृष्टि धुंधली कर दी है? ऊँची जीडीपी दरें, रिकॉर्ड निवेश और उत्पादन के नए शिखर भले ही उपलब्धि लगें, पर एक मूल सवाल दबता जा रहा है—क्या इस विकास ने इंसान को अधिक स्वस्थ, अधिक शिक्षित और अधिक खुश बनाया है? आर्थिक वृद्धि की अंधी दौड़ में हमने संख्याओं को ही सफलता का पर्याय बना दिया है। परिणामस्वरूप विकास की परिभाषा सिमटकर सकल घरेलू उत्पाद तक रह गई है, जबकि मानव जीवन की गुणवत्ता, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक न्याय पीछे छूट गए हैं। चमकती अर्थव्यवस्था के पीछे छिपी यह खाई अब स्पष्ट दिखाई देने लगी है।
जीडीपी किसी राष्ट्र के कुल उत्पादन और सेवाओं के आर्थिक मूल्य का आकलन करता है, पर यह मानवीय कल्याण का सच्चा प्रतिबिंब नहीं बन पाता। प्रदूषण बढ़े और उसकी सफाई पर खर्च हो, तो वह भी जीडीपी में बढ़ोतरी के रूप में दर्ज होता है। अपराध बढ़ें और सुरक्षा पर अधिक व्यय किया जाए, तो उसे भी आर्थिक सक्रियता माना जाता है। इस तरह जीडीपी उन गतिविधियों को भी विकास घोषित कर देता है जो समाज को भीतर से निर्बल बनाती हैं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्टों के मुताबिक 2030 तक चयनित पारिस्थितिकी सेवाओं के पतन से वैश्विक जीडीपी में 2.7 ट्रिलियन डॉलर की वार्षिक हानि हो सकती है। साफ है कि उत्पादन बढ़ने के साथ विनाश की भारी कीमत भी चुकाई जा रही है।
मानव विकास का व्यापक नजरिया स्पष्ट करता है कि आय केवल एक पहलू है। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम की मानव विकास रिपोर्टें स्वास्थ्य, शिक्षा और आय के संतुलित संयोजन को वास्तविक प्रगति की कसौटी मानती हैं। अनेक उच्च जीडीपी वाले देशों में भी खुशहाली सूचकांक अपेक्षित ऊँचाई तक नहीं पहुँचा, क्योंकि सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़े हैं और मानसिक दबाव बढ़ा है। जब नीतियाँ केवल आर्थिक विस्तार पर टिक जाती हैं, तब असमानता और गहरी होती है तथा विकास का लाभ सीमित वर्ग तक सिमट जाता है। यही असंतुलन समाज की आधारशिला को धीरे-धीरे क्षीण करता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में जीडीपी-आधारित सोच की नाकामी सबसे तीखे रूप में सामने आती है। आर्थिक वृद्धि के बावजूद प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से उपजी बीमारियाँ लगातार फैल रही हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि वायु प्रदूषण और जलवायु संकट वैश्विक मृत्यु दर में चिंताजनक बढ़ोतरी कर रहे हैं। नवीनतम अनुमानों के अनुसार भारत में प्रदूषण से 2 मिलियन से अधिक मौतें प्रतिवर्ष हो रही हैं। यह आंकड़ा उस विकास मॉडल पर सवाल उठाता है जो उद्योगों को वरीयता देता है, किंतु स्वच्छ हवा और सुरक्षित जल को नहीं। मानसिक स्वास्थ्य का संकट, खासकर युवाओं के बीच, इसी असंतुलन की नई और गंभीर अभिव्यक्ति बन गया है।
शिक्षा भी जीडीपी की सीमित सोच से अछूती नहीं है। सरकारी और निजी निवेश बढ़ने पर खर्च तो बढ़ता है, पर गुणवत्ता और समान अवसर की गारंटी नहीं मिलती। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शैक्षिक खाई भविष्य की उत्पादकता पर सीधा असर डालती है। मानव विकास सूचकांक में शिक्षा को केंद्रीय महत्व दिया गया है, क्योंकि ज्ञान और कौशल ही दीर्घकालिक टिकाऊ समृद्धि का आधार हैं। यदि विकास का लाभ समान रूप से वितरित न हो, तो वंचित वर्ग अवसरों से दूर रह जाता है। ऐसी स्थिति में जीडीपी की वृद्धि केवल सतही सफलता बनकर रह जाती है, जो सामाजिक गतिशीलता को गति नहीं दे पाती।
पर्यावरणीय असंतुलन जीडीपी मॉडल की सबसे गंभीर कमजोरी बनकर उभरा है। वन कटाई, खनन और बेलगाम औद्योगीकरण उत्पादन तो बढ़ाते हैं, किंतु जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर देते हैं। आकलन बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से होने वाला वार्षिक आर्थिक नुकसान वैश्विक स्तर पर जीडीपी के 4 प्रतिशत तक 2050 तक और 20 प्रतिशत तक सदी के अंत तक पहुँच सकता है, जबकि कुछ देशों में यह वैश्विक औसत से 30-60 प्रतिशत अधिक हो सकता है। समुद्री अम्लीकरण, जल संकट और भूमि क्षरण आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा खतरा हैं। जब विकास प्रकृति के विरोध में खड़ा होता है, तब वह अपने ही आधार को कमजोर कर देता है। स्थिरता को केंद्र में रखे बिना कोई भी आर्थिक उपलब्धि दीर्घकालिक नहीं ठहर सकती।
दुनिया के कुछ राष्ट्रों ने इस असंतुलन को समझकर वैकल्पिक रास्ते अपनाए हैं। भूटान का ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस सूचकांक संस्कृति, पर्यावरण और सामुदायिक जीवन को विकास आधार मानता है। ओईसीडी का बेटर लाइफ इंडेक्स अवकाश, सामाजिक रिश्तों और पर्यावरणीय गुणवत्ता को परखता है। न्यूज़ीलैंड ने वेलबिंग बजट के जरिए स्वास्थ्य और शिक्षा को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा है। ये पहल दर्शाती हैं कि विकास केवल उत्पादन वृद्धि नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव का समग्र विस्तार है।
भारत के संदर्भ में यह विमर्श और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद स्वास्थ्य असमानता, शिक्षा की खाई और पर्यावरणीय संकट लगातार गहराते जा रहे हैं। युवाओं में ईको-एंग्जायटी और भविष्य को लेकर असुरक्षा बढ़ती दिखाई दे रही है। यदि नीतियाँ कल्याण पर केंद्रित न हों, तो आबादी का बड़ा हिस्सा विकास की मुख्यधारा से बाहर छूट जाएगा। आर्थिक सर्वेक्षणों में भी पर्यावरणीय जोखिम और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों को रेखांकित किया गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि अब विकास की दिशा पर गंभीर पुनर्विचार अनिवार्य बन चुका है।
प्रश्न यह नहीं कि जीडीपी महत्वपूर्ण है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वही पर्याप्त मान ली जाए? आर्थिक वृद्धि जरूरी है, किंतु वह माध्यम है, लक्ष्य नहीं। वास्तविक प्रगति तब मानी जाएगी जब प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ हवा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएँ और सुरक्षित पर्यावरण उपलब्ध हों। विकास तभी अर्थपूर्ण है जब वह मानव जीवन को बेहतर और समृद्ध बनाए। भारत समेत विश्व के देशों के पास अवसर है कि वे विकास को पुनर्परिभाषित करें—संख्याओं से आगे बढ़कर मनुष्य और प्रकृति को केंद्र में स्थापित करें। खुशहाली, स्वास्थ्य और संतुलन ही वे मजबूत आधार हैं, जिन पर स्थायी और न्यायपूर्ण भविष्य की इमारत खड़ी हो सकती है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
.jpg)
