काव्य :
अबके होली
होली अबके मुझे
ना सुहाए
जबसे कान्हा तुम
मथुरा सिधाए
मैं सुहागिन बनी
दुहागिन
मोरे पिया को अब
रुक्मिणी भाए।
जबसे श्यामा श्याम
बनी
रंग लगे सब
रंगहीन
सखियों- संग अब
ना सुहाए
कदंब तले खड़ी
अकेली
मन मेरा गम से
सिसकाए।
मथुरा,गोकुल,वृंदावन
सरसे
बरसाने में अनगिन
लट्ठ बरसे
गोप-गोपियाँ भीग रहे
रंगों में
जहाँ-जहाँ कान्हा
तुम परसे
मुझ बिरहन पर
बस श्याम रंग ही
दमके।
- डा.नीलम ,अजमेर
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