दूर का युद्ध, पास का असर: तेल संकट और भारत की चिंता
[वैश्विक युद्ध की लपटें और भारत की थाली तक पहुंचता असर]
[जंग की आंच में तपता तेल बाजार और भारत के शहरों की बदलती तस्वीर]
• प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
तेल के वैश्विक बाजार में आई उथल-पुथल ने भारत के शहरी जीवन और अर्थव्यवस्था के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। जब कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार पहुँचीं, तो इसका असर केवल आर्थिक आँकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखने लगा। बेंगलुरु जैसे बड़े महानगर में हजारों रेस्तरां द्वारा 10 मार्च से शहरव्यापी बंद की चेतावनी इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है। होटल उद्योग का कहना है कि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति बाधित हो गई है और यदि यह स्थिति जल्दी नहीं सुधरी तो शहर की खाद्य सेवाओं की निरंतरता पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह केवल व्यापारिक समस्या नहीं, बल्कि लाखों लोगों की दैनिक भोजन व्यवस्था और हजारों कर्मचारियों के रोजगार से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
युद्ध की आग में झुलसता मध्य पूर्व इस संकट की वास्तविक पृष्ठभूमि है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर बाजार में घबराहट फैला दी है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार संघर्ष बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अचानक उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई और 9 मार्च 2026 को लगभग 105 से 107 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर हुई। यह उछाल सामान्य बाजार उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराते गंभीर खतरे का संकेत है। युद्ध के शुरुआती दिनों में ही तेल की कीमतों में लगभग 35 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज हुई, जिसने ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की चिंता और बढ़ा दी है।
दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस संकट का केंद्र बन गया है। वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा और एलएनजी की बड़ी मात्रा इसी संकीर्ण जलमार्ग से गुजरती है। युद्ध और बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के कारण यहां से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही अनिश्चित हो गई है, जिससे आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ी है। कई शिपिंग कंपनियों ने अतिरिक्त सुरक्षा कारणों से सेवाएँ सीमित कर दी हैं और बीमा प्रीमियम भी तेजी से बढ़ गए हैं। परिणामस्वरूप तेल परिवहन की लागत बढ़ी और वैश्विक बाजार में कीमतें और ऊपर चली गईं। यही वजह है कि ऊर्जा बाजार में अस्थिरता लगातार बनी हुई है।
भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। देश अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में युद्ध या आपूर्ति संकट का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। तेल की कीमतें बढ़ने का अर्थ है कि आयात बिल के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी। इससे चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपये की विनिमय दर पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा संकट को भारत के आर्थिक नीति-निर्माता हमेशा अत्यंत गंभीरता से देखते हैं।
बेंगलुरु में उभरा रेस्तरां संकट इसी व्यापक समस्या का स्थानीय उदाहरण है। शहर के होटल और रेस्तरां संचालकों का कहना है कि कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति बाधित होने से उनके लिए नियमित रूप से भोजन तैयार करना कठिन हो गया है। यदि गैस आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो हजारों भोजनालयों पर संकट गहरा सकता है। आईटी उद्योग के कारण शहर में बड़ी संख्या में छात्र, पेशेवर और कामकाजी लोग रेस्तरां व फूड आउटलेट्स पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में इन सेवाओं में व्यवधान केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शहर की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित करेगा। इसी कारण होटल उद्योग संगठनों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
तेल की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल गैस आपूर्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करता है। कच्चा तेल महंगा होते ही परिवहन लागत बढ़ती है और इसका असर लगभग हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत में महंगाई दर लगभग 0.2 से 0.25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसका अर्थ है कि खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक सब कुछ महंगा हो सकता है। यदि कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहीं, तो यह महंगाई के नए दौर की शुरुआत कर सकती हैं, जिसका सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल भारत की आर्थिक वृद्धि को भी प्रभावित कर सकता है। यदि तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो देश की जीडीपी वृद्धि दर में लगभग 0.15 से 0.4 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसके साथ ही शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है, रुपया कमजोर पड़ सकता है और सरकारी वित्तीय संतुलन पर भी दबाव बढ़ सकता है। सरकार यदि करों में कटौती या सब्सिडी के जरिए राहत देने की कोशिश करती है तो राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका भी रहती है। इसलिए यह संकट आर्थिक नीति के लिए एक जटिल चुनौती बन गया है, जिसमें संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।
बेंगलुरु में संभावित रेस्तरां बंद देश के लिए एक चेतावनी संकेत भी है। यदि ऊर्जा आपूर्ति में बाधा बनी रहती है तो यही स्थिति अन्य महानगरों में भी उभर सकती है। होटल और फूड सर्विस उद्योग भारत में लाखों लोगों को रोजगार देता है और शहरी जीवन का अहम हिस्सा है। इसलिए उद्योग संगठनों ने सुझाव दिया है कि सरकार को पाइपलाइन गैस की उपलब्धता बढ़ाने, वैकल्पिक ईंधन को प्रोत्साहन देने और आपातकालीन ऊर्जा भंडार का उपयोग करने जैसे कदम उठाने चाहिए। साथ ही ऊर्जा आयात के स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति भी जरूरी है, ताकि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर देश की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित न हो।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी एक क्षेत्र का संकट सीमाओं में नहीं रुकता, बल्कि दूर-दराज़ देशों के दैनिक जीवन तक असर डालता है। मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष हजारों किलोमीटर दूर भारत के शहरों में रेस्तरां सेवाओं को प्रभावित कर सकता है और आम लोगों की थाली तक असर पहुँचा सकता है। यदि तेल संकट लंबे समय तक बना रहा तो महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास सभी पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि भारत दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति पर तेजी से काम करे, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा, रणनीतिक तेल भंडार और मजबूत कूटनीतिक पहल शामिल हों। यही कदम भविष्य में ऐसे संकटों से देश को सुरक्षित रखने की सबसे प्रभावी दिशा साबित हो सकते हैं।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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