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व्यंग्य रचना : बुरा न मानो होली है -शारदा दयाल श्रीवास्तव ,भोपाल


 

 व्यंग्य रचना : 

बुरा न मानो होली है

        'बुरा न मानो' यह होली का एक ऐसा डिस्क्लेमर है जो हर तरह की हुड़दंग को वैधता प्रदान करता है। सब कहते हैं कि होली रंगों और भाईचारे का त्योहार है, हम कहते हैं होली पुराने हिसाब चुकता करने का मौका है। जिस प्रोफेसर से खुंदस हो, होली के बहाने उसके घर जाओ और चुपके से उसके सोफे की तांत पर ब्लेड मार कर आ जाओ । मातहतों की भीड़ में छुपकर अपने खूसट बॉस के माथे पर चुनाव वाली अमिट स्याही के टीके से उसकी रंगारंग होली को ब्लेक एण्ड व्हाइट बना दो। मुहल्ले के जिस लड़के से न बनती हो उसे कीचड़ में लथोर दो। इसके अलावा 'मुहल्ला क्वीन' के घर जाकर उसके बाप को हैप्पी होली, कहने के बहाने अपनी 'छप्पन छुरी' के दीदार से अपना दिन रंगीन कर लो। हमारे जमाने में कॉलेज में होली पर टाइटिल बनते थे; किसी मगरूर लड़के की हेकड़ी निकालने के लिये उसे ' थोथा चना- बाजे घना' का टाईटिल दे देते थे और लड़कों से बिदक कर रहने वाली कन्या को ' बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम' के टाइटिल से नवाज कर उसके भाव उतारे जाते थे। अपने होश सम्हालने के बाद अपन तो होली का विधान ऐसे ही समझते आए हैं।  

‎होली पर मुहूर्त का बड़ा झंझट है, कभी ग्रहण लग जाता है तो कभी कोई अशुभ नक्षत्र; ठिकाना ही नहीं पड़ता कि होली कब जलना है, कब खिलना है । मुहूर्त के कन्फ्यूजन में त्योहार अब दो दिन मनाए जाने लगे हैं। हमें तो समस्या यह है कि 'होली स्पेशल' पुराने कपड़े तो एक दिन के लिये छाँटे थे, दूसरे दिन क्या पहनें? हम लड़के लोग तो फिर से वही कपड़े पहन लेंगे पर श्रीमती जी की प्रॉबलम का क्या करें? वह दोनो दिन सेम सूट पहन कर क्या मुँह लेकर जायेगी अपने ग्रुप में ? इसलिये आजकल सोशल मीडिया पर ही होली की हुड़दंग मचती है ,सेलफोन भीतर से कई कई चटक रंगों से सराबोर हो जाता है ।सभी एक -दूसरे का शुभ शुभ चाहते हैं ,दोस्तों का भी -दुश्मनों का भी । कोई किसी के घर भी नहीं जाता -बस संदेश आते रहते हैं। कहते हैं -संसार रंगों की होली खेलता है लेकिन संत का फाग तो उसके भीतर ही मनता है ,उसकी होली तो उसके अंतरआकाश में बसे प्रेमनगर के 'गोविंद' से होती है ।व्हाट्सएप्पीय और फेसबुकिया होली भी अंतरआकाश में क्रीड़ारत होली की तरह ही है -एकदम चटक, रंगीन, मस्त, प्रेममय, आनन्दमय, निरापद, निखर्ची, आरामदेह , हाईजेनिक और निर्जला। कई रिसोर्ट्स में नये-नये बने बाबू-शोना के होली सेलीब्रेशन का एक अलग प्रेमाकाश रचा जाता है जहाँ रंग और ड्रिंक्स में डूब कर जोड़े आपस में होली खेलते हैं, डी जे बजता है- आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली, चाहे भीगे तेरी चुनरिया चाहे भीगे चोली,,,,,, यहाँ कपल्स की भीड़ है पर सब जोड़े बस अपने आप में अकेले हैं। इस फागचारे में ना भाईचारा है ना ही समाजिक लिहाज। बरसाने की 'लठ्ठमार होली' और इंदौर के 'गेर' की सामाजिक परम्परा दुनियाँ भर में कौतूहल से देखी जाती है और रिसोर्ट की रोमांटिक फाग में, यौवनाओं के भीगे वस्त्रों से झांकते उभार, और युवकों की ललचाई नजरें दिखाई देतीं हैं।

‎बावजूद इसके होली की उमंग आज भी कायम है ; बंद कमरे में या शहर के बाहर किसी फार्महाउस में,,,,,खूब जमेगा रंग ,जब मिल बैठेंगे चार यार,,,,,लेकिन फाग के दिन बंद ठेके ' रंग में भंग ' डाल जाते हैं ॥

‎होली के बाद महीने भर तक लोग पूछते हैं कि कैसी रही होली? अब व्यंग्यकार क्या बताए कि उसका फाग तो उसके व्यंग्यों के पाठन के साथ होता है, वह होली पर रचना तैयार करता है, फिर कम्प्यूटर पर उसमें चटख रंगों के छींटे मारता है, पिचकारी- गुलाल के चित्र प्रिंट करता है और फिर बचता फिरता है कि कहीं कोई बेशऊर उस पर रंग न छिड़क दे। वह आतुर हो उठता है कि शहर भर में होली की हास्य-व्यंग्य गोष्ठियों में कोई उसे बुला कर उसकी रचना सुनले तो होली रंगारंग हो जाए नहीं तो यह व्यंग्यकार चिल्ला-चिल्ला कर कहेगा कि इस शहर के लोगों में न तो साहित्यिक रुचि है और न ही हँसने का जज्बा। व्यंग्यकार को तो अपनी रचना पेल कर शहर साहित्यमार्गी लगता है।  

‎होली के कई आयाम कई प्रयोजन हैं।इसी शहर में एक पुत्ती बाबू हैं, वैसे ओहदे से तो किसी दफ्तर के बाबू हैं पर दिल के पूरे लम्पट बादशाह हैं। रसिकपन उनके मिजाज में है। होली के दिन उनसे कोई नहीं मिल पाता, मिल क्या नहीं पाता वे मिलते ही नहीं, घर वाले ही कह देते कि वे निकल गए। वैसे निकल कर वे सिर्फ बॉस के घर जाते हैं, अबकी बार दो जगह गए। बॉस को टीका गुलाल लगाने के बाद वे अपने रिश्ते के एक समधी के निधन के कारण 'अनरहे' की पहली होली पर पहुँचे। अभागन समधिन ने दरवाजा खोला, पुत्ती बाबू भी रुआँसा मुँह बना कर अभिवादन कर बैठक में जम गए। कुशलक्षेम और थोड़े दुख इजहार के बाद समधन चाय का पूछ कर अंदर चली गईं और शीघ्र ही चाय के साथ नमकीन और गुजिया भी ले आईं। 'अरे इसकी क्या जरूरत थी' के औपचारिक संवाद के बाद पुत्ती बाबू ने गुजिया की पहली बाईट पर ही 'वाह' कहा फिर पूछा- ये आपने घर पर बनाई है ? समधिन ने संकोच से सिर हिलाया और कहा कि गुड़िया के बच्चे आ जाते हैं, उनके लिये बनाई है। पुत्ती बाबू की खासियत यह थी कि पराईनार को देखते ही उनकी प्रेमग्रंथि सक्रिय हो जाती थी, वे हर स्त्री पर आसक्त हो जाते थे फिर ये तो रिश्ते में भी समधिन थीं। अब पुत्ती बाबू नें गुजिया की तारीफ में कहा- बहुत ही उम्दा गुजिया बनातीं हैं आप, भाभी जी। जितनी देखने में सुन्दर उतनी ही खाने में स्वादिष्ट। देखिये इतना सिकने के बाद भी एकदम फक्क सफेद रखी है और अंदर का भरावन तो इतना आनन्ददायक है कि कुछ पूछो ही मत। हाथों में जादू है, भाभी जी आपके। समधिन उनका लाईनमार आशय अच्छे से समझ रहीं थीं ।पुत्ती बाबू गुजिया की गोलाई को सफाई से गोंठने वाली उँगलियों पर भी अपना प्रशंसा वक्तव्य जारी कर ही रहे थे कि समधिन ने बीच में ही टोक कर रसोई तैयार करने का बहाना बनाया और उन्हे जाने का संकेत दिया। पुत्ती बाबू को उठना पड़ा वर्ना वे तो गुजिया के अंदर भरावन के किसमिश, चिरौंजी, गरी आदि पर भी अपनी निपुण टिप्पणी जारी करने के मूड में आ गये थे।

‎हर साल होली पर बजने वाला फिल्म नवरंग का एक गीत है , जिसमें युवती कहती है ; " अरे जा रे हट नटखट ,तू छू न मेरा घंघट ,पलट के दूंगी आज तुझे गाली रे ......."    युवक जवाब देता है , "आया होली का त्योहार ,तू है नार नखरेदार मतवारी रे ,आज मीठी लगे है तेरी गारी रे ......" अब भला पुरुष को गाली क्यों न मीठी  लगे ? स्त्री तो गाली देकर भी स्वयं को ही अपमानित करती है ,आखिर गालियों की धरती तो स्त्री की देह ही है। गाली पुरुष दे  या स्त्री, सदियों से हर बार नारी की देह ही तो क्षत-विक्षत की जाती रही है। पुरुष की लम्पटता की दस्तावेज हैं-गालियाँ

‎बस यूँ मान लो ,होली अब 'फाग' नहीं रही। अब 'प्री होली सेलीब्रेशन्स' होते हैं ,एकदम व्यवस्थित ,शालीन,सभ्य तरीके से ।' पोस्ट होली सेलीब्रेशन' भी हैं जिसे देशी भाषा में ' होली मिलन समारोह कहते हैं । मिलने- मिलाने के लिये भी अब समारोह करना पड़ते हैं। ये समारोह महीने भर तक कभी भी अपनी सुविधा से मनाए जाते हैं और इसमें मुहूर्त की जरूरत भी नहीं है । यह सियासी हस्तियों की कोठियों में और रसूखदारों की प्रेमनगरी अर्थात् भव्य लान में आयोजित होते हैं ,जहाँ मेजवान स्वयं  ' गोविन्द ' होता है और स्वयं की चरणवंदना करवाता है ।भक्त अपने ' गोविंद ' की एक झलक पाकर कृत- कृत हो जाता है ।अपने समर्थकों को रिझाए रखने का यह बढ़िया मैकेनिज्म है ।इन आयोजनो के लिये ये लाईनें ठीक बैठती हैं-

‎जहाँ प्रेम तहूँ नेम नहीं ,तहाँ न बुधि त्योहार ,

‎प्रेम मगन जब मन भया ,तब कौन गिने तिथि बार॥

 - शारदा दयाल श्रीवास्तव

अयोध्या बाई पास,भोपाल

मो 9425880629

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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