काव्य :
उपहार तुम हो
सृष्टि का उपहार तुम हो
धरा पर बहार तुम हो
मौसम को है कौन ,जानता ?
शरद-बसंत बहार तुम हो ।।
कलियों का चिरयौवन ,तुम हो
तितली सी मनभावन,तुम हो
भँवरे तुम पर मंडराते , ऐसे
जैसे,वसुधा का आकर्षण तुम हो ।।
ऋतुओं का श्रृंगार,तुम हो
फूलो पर, बहार तुम हो
देवो के मस्तक पर,अर्पित
पूजा में ,हरसिंगार तुम। हो.
- देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल
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