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लघुकथा : कौड़ी का मोल - उमेश कुमार गुप्ता (लवकुश),भोपाल




लघुकथा :

 कौड़ी का मोल

       गाँव के पुराने बाजार में एक बूढ़ा दुकानदार बैठा था। उसकी छोटी-सी दुकान पर लोग कम ही आते थे। सामने ही एक चमचमाती नई दुकान खुल गई थी, जहाँ भीड़ लगी रहती थी।

एक दिन एक लड़का बूढ़े के पास आया और बोला,

“बाबा, आपके पास क्या है? वहाँ तो सब कुछ मिलता है।”

बूढ़े ने मुस्कुराकर एक छोटी-सी कौड़ी उसकी हथेली पर रख दी और कहा,

“इसे रख लो, इसका मोल बहुत है।”

लड़का हँस पड़ा—“इसकी तो कोई कीमत नहीं होती!”

बूढ़ा शांत स्वर में बोला—

“बेटा, बाजार में शायद नहीं…

पर कभी-कभी इंसान की असली कीमत भी दुनिया को कौड़ी भर ही लगती है।”

लड़का कुछ देर चुप रहा।

सामने चमकती दुकान अब उसे थोड़ी फीकी लगने लगी।

संदेश:

दुनिया अक्सर चमक-दमक से कीमत तय करती है, पर असली मूल्य समझने के लिए दृष्टि चाहिए।

 - उमेश कुमार गुप्ता (लवकुश)

रिटायर प्रिंसिपल जिला न्यायधीश 

 भोपाल


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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