लघुकथा :
पीर पराई
- उड़ा दिये छह। इस बार इन्हें निबटा ही देना चाहिए - अपने स्वाभावानुसार बड़े बाबू गुप्ताजी, कर्कश आवाज में उबले पड़ रहे थे। उनकी आंखें बाहर निकल पड़ने को आतुर दिख रही थीं। चेहरा लाल हो गया था।
प्रतिदिन की तरह आज भी कार्यालय में सुबह उपस्थित होकर सभी कर्मी बड़े बाबू की टेबिल के पास इकट्ठा होकर देश के हालात पर चर्चा कर रहे थे। इनमें अधिकतर वे थे, जिनकी जानकारियांे का स्रोत सोशल मीडिया है।
शर्माजी अपने मोबाइल से व्हाटसएप फारवर्ड की तस्वीरे दिखाते हुए गर्व पूर्ण ढंग से बोले - देखो कैसे पूरी इमारत ही ध्वस्त कर दी -
- 71 की तरह इस बार कोई समझौता नहीं होना चाहिए - अपने बेटे का इंजीनियरिंग में दाखिला कराकर आज ही काम पर लौटे त्रिपाठी जी भी जोश में थे।
पिछले दो दिनों से कार्यालय में हो रही इस बहस से विरत, सभी टेबिल-कुर्सियों की साफ-सफाई कर आफिस के कोने में पड़े स्टूल पर कार्यालय सहायक रमेशचंद्र उदास बैठा था। उसकी आंखें इस गर्मा-गर्म बहस से कहीं दूर शून्य में निहार रहीं थीं, कान मोबाइल की रिंगटोन सुनने को बेताव थे।
रह-रह कर वह अपने मोबाइल को देख लेता था। उसे अपने बड़े बेटे की बहुत चिंता हो रही थी। दो साल पहले ही तो वह सेना में अग्निवीर के तौर पर भर्ती हुआ था। अग्निवीर बनने के एक साल बाद ही उसने उसकी शादी भी कर दी थी। इन दिनों उसकी पोस्टिंग वर्तमान में तनावग्रस्त सीमावर्ती क्षेत्र में ही थी। घर में उसकी पत्नी गर्भवती है। हाल में ही सीमा पर तनाव शुरू होने से पहले उससे पूरे परिवार की बात हुई थी। वह बच्चा होने के समय घर आने की योजना बना रहा था। बेटे की नौकरी लग जाने से घर की आर्थिक स्थिति भी सुधर गई थी। सब कुछ हंसी-खुशी चल रहा था।
जब से यह तनाव पूर्ण स्थिति बनी है, कृष्णा का फोन नहीं आया था। मोबाइल करने पर ’पहुंच से दूर’ होने का संदेश सुनाई देने लगता। पूरा परिवार बेहाल और चिंतातुर था।
कार्यालय में अभी बात चल ही रही थी कि मिश्रा जी, जो अक्सर लेट ही आते हैं, ने प्रवेश करते हुए बड़े ही निराशाजनक स्वर में ताजा समाचार बताया कि सीमा पर सीजफायर हो गया है।
कार्यालय में मातम सा पसर गया। गुप्ता जी, शर्मा जी, त्रिपाठी जी सब के चेहरे लटक गए। हां, स्टूल पर उदास बैठे कृष्णा में जैसे एकदम से जान आ गई हो। वह जल्दी स्टूल से उठा और मोबाइल पर यह खबर अपने घर पर देने के लिए कार्यालय से बाहर को लपका।
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- कमलेश झा
झांसी - 9450908514
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