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मोनालिसा भोसले का कदम हजारों गरीब लड़कियों के सपने कुचलने वाला -सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल' , इंदौर


 

मोनालिसा भोसले का कदम हजारों गरीब लड़कियों के सपने कुचलने वाला

- सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल' , इंदौर

      महेश्वर, मध्यप्रदेश की तंग गलियों से निकलकर प्रयागराज महाकुंभ की पावन रेती पर अपनी नीली-भूरी आंखों की सादगी से  देश में रातों-रात वायरल होने वाली गरीब, दलित हिंदू लड़की मोनालिसा भोसले ने आज तिरुवनंतपुरम के अरुमनूर श्री मदन थंपुरन मंदिर में विधर्मी फरमान खान के साथ शादी करते हुए खुद को बंधन में बांध लिया है।

मात्र 19 वर्षीय मोनालिसा जो फिलहाल माॅडलिंग और फिल्मों में काम कर रही थी, जिसमें उसके गरीब माता-पिता ने उसे बढ़ाने में भरपूर सहयोग भी किया। लेकिन मोनालिसा ने बिना खुद को स्थापित किए ही, इतनी जल्दी माता-पिता और परिवार के खिलाफ जाकर सोशल मीडिया पर बने मित्र महाराष्ट्र के मुस्लिम युवक फरमान खान से शादी कर ली है। 

वृहद परिपेक्ष्य में समझे तो यह केवल उसका व्यक्तिगत चुनाव नहीं, बल्कि एक समूचे समाज की उम्मीदों पर किया गया वज्रपात है। जब अभावों में पली-बढ़ी कोई बेटी समाज के शिखर पर पहुंचती है, तो वह केवल एक नाम नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब और वंचित समाज की बेटियों के लिए भरोसा और आदर्श बन जाती है। जिसके चलते दूसरी बेटियां भी आंखों में बेहतर कल के सपने संजोए बैठी हैं। आज मोनालिसा ने उसी भरोसे की बुनियाद हिला दी है। गरीबों के जीवन में धन-दौलत भले ही कम हो, लेकिन कुल की इज्जत और मर्यादा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। मोनालिसा के माता-पिता ने संघर्षों की आग में तपकर अपनी बेटी को वह आकाश दिया था जो उनके समाज के नियम कायदों से ऊपर था। वे चाहते थे उनकी बेटी स्वतंत्र होकर उड़ सके, प्रसिद्ध बने। लेकिन किसे पता था कि वही उड़ान एक दिन अपनों को ही कलंकित कर देगी।

​समाज में सफलता का अर्थ केवल फिल्मी पर्दे पर चमकना या सुर्खियां बटोरना नहीं होता, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर अपनी विरासत का मान बढ़ाना होता है। जिस समाज ने मोनालिसा को पलकों पर बिठाया, वहां लड़कियों की प्रगति पर कभी पाबंदी तो नहीं रही, लेकिन उस स्वतंत्रता की एक अलिखित मर्यादा होती है कि वहां की लड़कियां अपनी ही संस्कृति के भीतर रहकर खुशियां तलाशे। 

उसके पिता जय सिंह भोसले का विरोध किसी संकीर्ण मानसिकता का परिचय नहीं था, बल्कि उस पिता की तड़प थी जो अपनी बेटी को ऐसे रास्ते पर जाने से रोकना चाहता था जो अंततः विनाशकारी प्रतीत होता है क्योंकि आज जब भारत में इतने लव जेहाद के दुष्परिणाम सामने आ ही रहे है ऐसे में मोनालिसा को बचाने के लिए उसके पिता ने इंदौर के संयोगितागंज थाने में बेटी की सुरक्षा को लेकर गुहार भी लगाई थी, क्योंकि समाज के भीतर विवाह की परंपरा केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है जो पीढ़ियों से उनके समाज को बचाए हुए है।

​मोनालिसा का यह कदम जिसे आज वह अपनी आजादी का उत्सव मान रही हैं, वास्तव में एक ऐसी अदृश्य कैद की आहट है जिसे समाज लंबे समय से लव जिहाद के कड़वे सच के रूप में देखता आया है। 

भावनात्मक आवेग में आकर अपनी जड़ों को काट देना और फरमान खान जैसे विधर्मी के साथ जीवन का स्वप्न देखना, उस सांस्कृतिक धरोहर का तिरस्कार है जिसने उन्हें यह पहचान दी। सबसे हृदयविदारक तो वह क्षण था जब सफलता के नशे में चूर होकर इस बेटी ने केरल के थम्पानूर पुलिस स्टेशन में अपने ही जन्मदाता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई। यह उस भारतीय संस्कृति के गाल पर करारा तमाचा है जहां पितृ देवो भव के संस्कार दिए जाते हैं। एक पिता जिसने अपनी पूरी उम्र बेटी की खुशियों के लिए गला दी, उसे दुनिया के सामने खतरे के रूप में पेश करना उस त्याग का अपमान है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

साथ ही ​इस विवाह के दुष्परिणाम केवल मोनालिसा के व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्होंने अनजाने में उसने हजारों दलित और गरीब बच्चियों के सपनों के रास्ते में ऐसा रोड़ा खड़ा कर दिया है जिसे हटाना अब मुश्किल सा होगा। अब समाज के दूसरे गरीब माता-पिता जो अपनी बेटियों को बाहर भेजने और उन्हें स्वावलंबी बनाने का साहस नहीं जुटा पाएगे, वे अपनी बेटियों की उड़ानों पर रोक लगाने को मजबूर होंगे। उनके मन में यह डर बैठ गया है कि कहीं उनकी बेटी भी मोनालिसा की तरह सफलता मिलते ही अपने संस्कारों को तिलांजलि न दे दे। 

एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में मोनालिसा अपने समाज के लिए एक मशाल बन सकती थीं, वे उन करोड़ों लड़कियों की प्रेरणा बन सकती थीं जो गरीबी से लड़कर अपनी पहचान बनाना चाहती हैं, लेकिन उसने एक विवादित राह चुनकर उन सभी मासूम लड़कियों के सपनों को भी चुनौती दे ही दी है।

​प्रशासनिक गलियारों और राजनीतिक हस्तियों के लिए यह सामाजिक सद्भाव का एक अवसर हो सकता है, लेकिन समाज के भीतर उठी यह टीस चीख-चीख कर कह रही है कि अपनों के आंसुओं पर बनाई गई खुशियों की मीनारें कभी स्थाई नहीं होती। यह घटना हमें इस गंभीर चिंतन की ओर ले जाती है कि क्या आधुनिकता का अर्थ अपनी पहचान खो देना है? क्या प्रगतिशील होने के लिए अपने माता-पिता के मान-मर्दन की अनुमति मिल जाती है? मोनालिसा ने आज जो किया है, उसकी गूंज आने वाले लंबे समय तक समाज के उन घरों में सुनाई देगी जहां आज भी मर्यादाओं को प्राणों से प्यारा माना जाता है। अंततः यह स्वीकार करना कठिन है कि एक चमकता सितारा इतनी जल्दी विधर्मियों के अंधेरों में खो जाएगा और पीछे छोड़ जाएगा एक ऐसा समाज जो अब अपनी बेटियों को चकाचौंध से बचाने के लिए और भी संकुचित होने को विवश होगा।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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