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लघु कथा : बीते दिन - डॉ मंजू लता ,नोयेडा


 


लघु कथा :

 बीते दिन 

       कई साल गुजर गए। आज भी वो दो कातर आंखें मुझे याद आते रहते हैं। बात उन दिनों की है जब मेरे पति रायपूर से इलाहाबाद आये थे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर ज्वाईन किया था। वैसे तो विश्वविद्यालय की ओर से क्वार्टर मुहैया कराई जाती थी। लेकिन उस समय कोई क्वार्टर खाली नहीं था।

लिहाज़ा हम लोगों को किराये के मकान में एक साल तक रहना  पड़ा। मुहल्ला काफ़ी घना था। सभी तबके के लोगों ने सुन्दर-सुन्दर मकान बनवाया था।

                   मेरे मकान के बगल में एक मैनेजर रहते थे, जो किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। पत्नी गृहणी थीं। दो बच्चे थे, एक बेटा एक बेटी। दोनों ही अभी छोटे थे। एक सातवीं कक्षा में, दूहरी आठवीं में थी।

मैनेजर की माता जी साथ रहती थी। पिता बहुत पहले गुजर गये थे। माँ ने मुसीबतों का सामना करते हुए उन्हें पाला था। किसी चीज की कमी होने न दी थी।

उनके पास जो भी जमा-पूंजी थी सब बेटे की परवरिश में लगा दिया था। अब वे पूर्णरूपेण बेटे बहू पर निर्भर हो गई थीं।

                      मैनेजर की पत्नी बहुत मिलनसार थीं। हमलोगों से दोस्ती बढ़ाने के लिये पहले उन्होंने ही पहल की। बातचीत में कुशल थीं।

उनसे प्रभावित हुए बिना मैं नहीं रह सकी।

फ़िर क्या था आये दिन वे अपने घर बुलाने लगी। मैं भी अक्सर जाने लगी। कभी कभार चाय-नाश्ता भी

दोनों साथ करते थे। उनका कहना था--------"अरे!क्या अकेले खाती रहती हो। आ जाया करो। साथ खाएंगे और बातें भी करेंगे। "

        उनकी बातों को मैं टाल नहीं सकती थी। अतः रोज़ तो नहीं लेकिन अक्सर उनके घर चली जाया करती थी।

       एक बात अजीब थी कि जब भी मैं जाती थी माता जी अकेले कमरे में सोई होती थी या एक कोने में दुबकी होती थी। बहु रेणुका को कभी उनसे बात करते नहीं देखा। जहाँ वो मुझे बैठाती वहाँ से दो कातर आँखें मुझे दिखती रहती थी। जिनमें आंसू भरे होते थे।उनसे बातें करने को मेरा मन मचल जाता था। पर रेणुका जी ने कभी नहीं कहा-------

"चलो अपनी सासू माँ से मिलवा दूँ"।मेरे मन की बात ईश्वर ने सुन ली। उस दिन रेणुका जी बगल में कथा सुनने गईं थीं। मैं माता जी के कमरे में गई और

कहा------"प्रणाम माता जी। मैं शालिनी। आप की नई पड़ोसन।

कभी आइये हमलोगों के बीच बैठिये। मन हल्का होगा।"

माता जी------" मना है बेटा। हम बुजुर्गों से कहाँ कोई बात करना चाहता। जबरदस्ती करूं, तो दस बात सुनना पड़ता है। बेटा बस इसी कमरे में सारा दिन कट जाता है। कब दिन होता है कब रात होती है पता भी नहीं चलता। अपना दुःख किसे बतायें। ख्याल रखने वाला तो चला गया। बच्चे ख़ुश रहें बस प्रभु से मनाती हूँ। मेरा क्या?" फ़िर उनकी आँखों से अश्रुधार बहने लगी। मुझ से देखा नहीं गया। मैंने कहा -----" फ़िर आऊंगी माता जी " कहते हुए मैने विदा ली।

       दो तीन दिन बाद ही रेणुका जी का फोन आया--------"शालिनी आज रविवार है। सब घर पर ही रहेंगे। इसलिए मैंने पनीर पुलाव और रायता तथा मखाने का खीर बनाया है। आ जाओ सब मिल कर एन्जॉय करेंगे। "

                    अब उनकी बात मैं नहीं टाल सकी। कुछ बातें हुई, फ़िर टेबल पर खाना लग गया। मैनेजर शशांक पत्नी रेणुका और बच्चे सब बैठे। मुझे भी बैठने को कहा गया। मैं बैठ गई।

रेणुका ने बेटे से कहा----"दादी को आवाज़ लगा दो। खाना खा ले आ कर।

माता जी धीरे-धीरे आईं और एक कोने में बैठ गईं। सब के लिए शीशे के सुन्दर प्लेट थे।

माता जी को रेणुका ने अलम्युनियम के थाली में परोस कर दिया। थोड़े से पुलाव और रायता था। माता जी मुरझाई चेहरे के साथ खाने लगीं। इस बार रेणुका ने बेटी से कहा-----"पूछो दादी से और कुछ लेगी "

माता जी ने थोड़ी और की मांग की। बेटी थोड़ा और पुलाव ले जाकर दूर से उनकी थाली में गिरा देती है। कुछ दाने इधर-उधर छिटक जाते हैं। 

                   मुझे यह देख दुःख होता था। मैंने बच्ची से कहा------"बेटा!ऐसे किसी को खाना नहीं दिया जाता। जैसे कोई अछूत हो। और वो तो तुम्हारी दादी हैँ। तुम्हारे पापा की माँ। कितने कष्ट सहे हैं इन्होंने तुम्हारे पापा को पैरों पर खड़ा करने के लिए। एक तो जिसे कुर्सी पर बैठाना था उसे फर्श पर बैठाया। इस उम्र में पैर मोड़ कर बैठना कितना कठिन होता है तुम्हें मालूम नहीं। "

        तभी रेणुका बीच में बोल उठी। तुम नहीं जानती शालिनी ये इसी लायक हैं। इन्होंने अपने समय में मुझे बहुत तंग किया था। आज मेरी बारी है, तब इन्हें पता चलेगा कि सताये जाने पर केसा लगता है।

             मैंने कहा रेणुका ये कोई अच्छी बात नहीं। फिर उनमें और तुम में क्याअन्तर रह गया। वही गलती तुमसे हो रहा है जो उन्होंने किया था। तुम्हारे बच्चे सब देख रहे हैं। कल को तुम्हारे साथ यही सलूक करेंगे, तब तुम्हारे पास कोई जबाब नहीं होगा। ऐसा कहते हुए मैं माता जी के कमरे में गयी। मैंने उनके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए पूछा-------"अच्छा माता जी बताइए आप दिन भर क्या सोचा करती हैं"

मेरे हाथों को हौले से दबाते हुए कहा ------

"बेटा बीते दिनों को याद करती रहती हूँ। यही सोचती हूँ क्या से क्या हो गया "

 - डॉ मंजू लता ,नोयेडा

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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