काव्य :
वो और हम...
तेरे हाथ है बम के गोले
मेरे हाथ पिचकारी है!
तुम खेलते खून की होली
यहां गुलाबी थाली है!!
आखिर क्या पाओगे सोचो,
केवल लाशों की गिनती!
या फिर हमने कितनी रंग दी,
लाल खून से यह धरती!
आखिर जीतेगी मानवता,
तुम कितना भी युद्ध करो,
चलो अहिंसा के पथ पर तुम,
जीवन अपना बुद्ध करो!!
नहीं विजय पाता है कोई,
जीत विनाश दे जाता है!
भारत बनकर तुम भी देखो,
बिना युद्ध सुख पाता है!!
बंद करो यह अहम का झगड़ा,
मानव जन्म अनूठा है!!
छोड़ो ये विस्तार की बातें,
यह सपना सब झूठा है!!
- सुरेश गुप्त ग्वालियरी
विंध्य नगर बैढ़न
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