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अपने संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए लोक से जुड़ना जरूरी है - डॉ.मीनू पांडेय


 

अपने संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए लोक से जुड़ना जरूरी है - डॉ.मीनू पांडेय

 "लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक " विषय पर  विमर्श और काव्य पाठ का आयोजन

सागर। बाल साहित्य शोध सृजनपीठ, साहित्य  अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा  महत्वाकांक्षी कार्यक्रम " लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक " (परंपरा कथा और काव्य का जीवंत संग़म) विषय पर आधारित विमर्श और काव्य पाठ का आयोजन  वरदान सभागार सिविल लाइंस सागर में किया गया. बाल साहित्य शोध सृजन पीठ म.प्र. की निदेशक प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका डॉ. मीनू पाण्डेय की विशिष्ट उपस्थिति में सम्पन्न हुए इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम के स्थानीय संयोजक श्यामलम् संस्था अध्यक्ष उमा कान्त मिश्र थे. हिन्दी साहित्य भारती अध्यक्ष अम्बिका यादव, साहित्यकार आर के तिवारी, श्रुतिमुद्रा समिति अध्यक्ष डॉ.कविता शुक्ला एवं हिन्दी साहित्य सृजन संघ सागर की अध्यक्ष सुनीला सराफ कार्यक्रम की सह संयोजक रहीं.

इस अवसर पर बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ मीनू पांडेय नयन ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि लोकध्वनि जब बाल ध्वनि के रुप में गूंजने लगेगी तो बालकों का नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित हो जायेगा। अपने संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए लोक से जुड़ना जरूरी है।सोशल मीडिया का बढ़ता हुआ प्रभाव हमारी भाषा भूषा और भोजन को दूषित कर रहा है। सुप्रसिद्द लेखक घनश्याम मैथिल अमृत भोपाल ने कहा - लोक ध्वनि से बाल ध्वनि को समाज कितना ध्यान देता था यह इससे जाहिर होता है कि ऋग्वेद यजुर्वेद एवं अथर्ववेद में बच्चों की शिक्षा और संस्कार संबंधित सूक्त दिये हुये हैं।

महाभारत में कुश्ती खोखो कबड्डी का विस्तार से वर्णन है। ताकि बच्चों का मानसिक ही नहीं शारीरिक विकास भी हो। वरिष्ठ लेखक गोकुल सोनी भोपाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि बच्चों में होने वाले डिजिटल अपराध रोकने के लिए माता-पिता को स्वयं इस आभासी दुनिया से दूरी बनाये रखनी होगी और बच्चों से संवाद स्थापित करना होगा।

इंक मीडिया के निदेशक समालोचक डाॅ.आशीष द्विवेदी ने कहा कि बाल मनोविज्ञान को समझे बगैर बाल साहित्य को गढ़ना संभव नहीं है। हमारे आसपास की लोक ध्वनियां ऐसी निर्झरियां हैं जिनमें भारत के प्राणतत्व बसते हैं। उन्हें सहेजकर  बाल मन  तक स्थानांतरित करना ही  बाल साहित्य का कार्य है। लोक ध्वनि विलुप्त होने से बच्चे पैरा सोशल दुनिया में विचरण करने लगते हैं।

श्रुति मुद्रा अध्यक्ष डॉ.कविता शुक्ला ने कहा कि भारतीय संस्कृति का विशेष महत्व मंत्रोच्चार,ॐ नाद इसके उदाहरण हैं. इन्हीं ध्वनियों से बाल ध्वनियों का निर्माण होता है. डॉ वर्षा तिवारी ने पुरानी परंपराओं से सीख लेने की आवश्यकता पर ध्यान आकृष्ट कराया. बाल कविताओं पर केंद्रित द्वितीय सत्र में डाॅ. नलिन निर्मल,प्रभात कटारे, प्रतिभा द्विवेदी मुस्कान, दीपाली गुरु, आर के तिवारी,भानु प्रताप यादव शुभारम्भ,प्रदीप पाण्डेय,पवन रजक,नीतू तिवारी, हर्षिता प्रताप सिंह एवं वरिष्ठ कवि वृंदावन राय सरल ने रचना पाठ कर प्रभावित किया. प्रथम सत्र का संचालन कवयित्री सुनीला सराफ ने तथा द्वितीय सत्र का संचालन कवि अम्बिका प्रसाद यादव ने किया.कवि मुकेश तिवारी ने सरस्वती वंदना की. प्रारम्भ में कार्यक्रम के स्थानीय संयोजक उमाकान्त मिश्र अध्यक्ष श्यामलम् ने कार्यक्रम परिचय दिया. इस अवसर पर आयोजक संस्थाओं की ओर से अतिथिवक्ताओं, कवियों और सभागार में उपस्थित समस्त श्रोताओं का पुष्पगुच्छ भेंट तथा शाम्भवी क्रिएटिव फाउंडेशन दिल्ली द्वारा अतिथियों, वक्तागणों व कवियों को स्मृति चिन्ह भेंट से सम्मानित किया गया.

आभार प्रदर्शन बाल साहित्य शोध पीठ की निदेशक डॉ मीनू पांडेय नयन द्वारा किया गया.

कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्ध नागरिकों तथा साहित्य प्रेमी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही जिनमें टी आर त्रिपाठी,हरि सिंह ठाकुर, अभिनंदन दीक्षित, रमेश चौकसे, डॉ नीलिमा पिंपलापुरे,डॉ सुश्री शरद सिंह, प्रो. दिनेश अत्री, पी आर मलैया,ज ला राठौर, डॉ अभय सिंह,डॉ वंदना गुप्ता,मनोज तिवारी, राघवेंद्र नायक,डॉ नवनीत धगट,आरती मिश्रा शुक्ला, नम्रता फुस्केले,ममता भूरिया, उषा बर्मन, विजया द्विवेदी,सौरभ दुबे, प्रवीण पाण्डेय, राकेश चतुर्वेदी,कल्पना चतुर्वेदी,वंदना पाण्डेय, सुमन शुक्ला, दिशा अत्री,असीम दत्त दुबे,अमित आठिया, मुकेश सोनी, हरी शुक्ला आदि के नाम उल्लेखनीय हैं.

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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