तात्कालिकता के भँवर में सृजन की साधना
- विवेक रंजन श्रीवास्तव ,भोपाल
वर्तमान डिजिटल युग ने मानव जीवन के हर पक्ष को प्रभावित किया है। साहित्यकार भी इससे अछूते नहीं है। आज साहित्य और सोशल मीडिया के अंतर्संबंधों पर दृष्टि डालें, तो एक विरोधाभासी परिदृश्य है। जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति के द्वार सबके लिए खुले हैं, वहीं दूसरी ओर तात्कालिक प्रसिद्धि के मोहपाश ने साहित्य की मूल प्रकृति यानी विचार 'धैर्य और गहराई' को जैसे अपहृत कर लिया है।
आभासी जगत की बिना पढ़े लाइक ,प्रशंसा वाले दौर में गम्भीरता का स्पष्ट अभाव परिलक्षित होता है। साहित्य मूलतः एकांत की साधना है। एक गंभीर, गवेषणात्मक लेखन के लिए जिस मानसिक मथनी और लंबे समय की चिंतन मनन की आवश्यकता होती है, उसे आज की 'नोटिफिकेशन संस्कृति' ने लील लिया है। सोशल मीडिया का स्वरूप 'अभी और इसी वक्त' टिप्पणी की मांग करता है। रचनाकार जैसे ही कुछ लिखता है, उसकी दृष्टि तुरंत मिलने वाली 'लाइक्स' और 'प्रतिक्रियाओं' पर टिक जाती है।
यह प्रवृत्ति आत्ममुग्धता को तो बढ़ाती है, लेकिन रचना के मानक गिर जाते हैं। गंभीर लेखन जो पर्याप्त समय और धैर्य की मांग करता है, वह इस शोर-शराबे में कहीं पीछे छूट गया है। जब रचनाकार का ध्येय केवल 'ट्रेंडिंग' होना , हो जाए, तो लेखनी में वह धार और शोधपरक गंभीरता नहीं बचती जो कालजयी साहित्य का आधार होती है।
इसी प्रसंग में जापानी लघु काव्य विधाओं, जैसे हाइकु, तांका और सेन्र्यू, का भारतीय भाषाओं में बढ़ता प्रभाव चर्चा का विषय है। निःसंदेह, अंतर्देशीय साहित्यिक संवाद की दृष्टि से यह एक स्वागत योग्य कदम है। इन विधाओं ने रचनाकारों को कम शब्दों में सघन भाव व्यक्त करने का एक नया धरातल दिया है।
किंतु, सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कुछ रचनाधर्मियों ने इन विधाओं के संक्षिप्त स्वरूप को 'प्रसिद्धि का शॉर्टकट' मान लिया है। उन्हें लगता है कि कुछ वर्णों को गिनकर पंक्तियाँ सजा देना ही काव्य है। इस प्रक्रिया में विधा का व्याकरण तो शायद बच जाता है, लेकिन इस कंप्यूटरी साहित्य से रचना की आत्मा , यानी वह गहन दार्शनिकता और अनुभूति गायब हो जाती है। बड़ी विधाओं उपन्यास, महाकाव्य या गंभीर निबंध के आवश्यक श्रम से बचने के लिए इन लघु विधाओं का कवच की तरह उपयोग करना साहित्य के स्वास्थ्य के लिए बहुत शुभ संकेत नहीं है।
क्या ए आई को रचनात्मक टूल के रूप में प्रयोग करने से लेखन कला की मौलिकता लुप्त हो सकती है, यह बड़ा सवाल है।
सोशल मीडिया के स्व संपादन तथा त्वरित प्रकाशन ने लेखक और पाठक के बीच की दूरी तो मिटाई है, लेकिन 'संपादकीय छननी' को समाप्त कर दिया है। पहले कच्ची रचनाएं कूड़ेदान में जाती थीं या बार-बार माँजी जाती थीं, आज वे सीधे 'वॉल' पर पोस्ट होती हैं। धैर्य का यह अभाव साहित्य को सतही बना रहा है। रचना के आधार भूत उद्देश्य बदल रहे हैं। यदि रचनाकार तात्कालिक वाहवाही के इस जाल से खुद को मुक्त नहीं करता, तो हम ऐसी पीढ़ी की ओर बढ़ेंगे जिसके पास शब्द तो करोड़ों होंगे, लेकिन 'अनुभव की गहराई' में शून्य होगी।
साहित्य केवल सूचना या मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति का दस्तावेजीकरण है। जापानी विधाओं का स्वागत अवश्य हो, या नई कविता के बढ़ते उपयोग को ' रचना प्रक्रिया के श्रम से बचने का मार्ग' नहीं बनाना चाहिए। रचनाकारों को समझना होगा कि जो साहित्य समय की कसौटी पर टिकता है, वह क्षणिक उत्तेजना से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साधना और अटूट धैर्य से जन्म लेता है। सोशल मीडिया एक प्रकाशन मंच हो सकता है, लेकिन वह सृजन की प्रयोगशाला या गंतव्य नहीं हो सकता।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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