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सभ्यता और युद्ध - विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल


 

सभ्यता और युद्ध

- विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

     मानवीय सभ्यता की कहानी वास्तव में मनुष्य की जिजीविषा और उसके संघर्षों की एक लंबी दास्तान है, किंतु इसे केवल युद्धों और विजयों के रक्त-रंजित पदचिह्नों से मापना एक बड़ी भूल होगी। सभ्यता का अर्थ अगर सुसंस्कृत होना है, तो युद्ध उसी संस्कृति का वह काला अध्याय है जो अक्सर विकास की आड़ में अपनी जगह बना लेता है। प्रारंभिक बस्तियों से लेकर आज के महानगरों तक की यात्रा में हमने संपत्ति, संसाधन और सीमाओं के लिए अनगिनत युद्ध लड़े। आदिम युग में जब मनुष्य वनों में रहता था, तब उसकी लड़ाई केवल अस्तित्व की थी, वह भोजन और सुरक्षा के लिए लड़ता था। किंतु मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है और समाज केवल व्यक्तिगत स्वार्थ या अराजकता से नहीं, बल्कि सामुहिकता के कुछ शाश्वत नियमों से संचालित होता है। यही कारण है कि आज जब हम अंतरिक्ष की सीमाओं का विस्तार कर रहे हैं, तब वहां किसी राष्ट्र विशेष का एकाधिकार नहीं, बल्कि मानव मात्र का साझा अधिकार घोषित किया जाना चाहिए। अंतरिक्ष पर, चांद या मंगल पर कब्जा करने की विकसित राष्ट्रों की वर्तमान  मनोवृत्ती हमारी आदिम भूलों की पुनरावृत्ति होगी।

सभ्यता के जिस विकास को आज हम ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में पढ़ते हैं, वह अक्सर अर्द्धसत्य प्रतीत होता है। यदि विकास वास्तव में हुआ होता, तो उसके साथ शांति की एक अविराम धारा भी प्रवाहित होनी चाहिए थी। संघर्ष प्रगति का परिचायक हो सकता है, लेकिन युद्ध मानवीय चेतना की हार है। सम्राट अशोक का उदाहरण इस संदर्भ में ऐतिहासिक ही नहीं, वरन दार्शनिक महत्व का है। अशोक ने कलिंग के भीषण रक्तपात के बाद जब शस्त्र त्यागे, तो वह मात्र एक राजा का हृदय परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह इस बोध की विजय थी कि विकास युद्ध को असंभव बनाने में है, न कि उसे बढ़ावा देने में। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमें इसी वैश्विक बोध की आवश्यकता है। पृथ्वी के प्राकृतिक भंडार, चाहे वे समुद्र की गहराइयों में हों या ध्रुवों के हिमखंडों में संग्रहित तेल और गैस, उन पर किसी एक शक्ति का नहीं बल्कि धरती की समस्त आबादी का नैसर्गिक हक है। यह समय की मांग है कि इन संसाधनों को 'वैश्विक साझा संपत्ति' मानकर एक सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय नियम बनाया जाए। जो राष्ट्र इन संसाधनों के दोहन में सक्षम हैं, वे इनका दोहन अवश्य करें, परंतु एकाधिकार के बजाय 'रॉयल्टी' जैसी न्यायपूर्ण व्यवस्था के माध्यम से इसका लाभ पूरी मानवता तक पहुँचाएं।

इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि महान सभ्यताओं के वैभव के पीछे रक्तपात की अनगिनत चीखें दफन हैं। मेसोपोटामिया से लेकर रोम तक, विकास ने हमें विज्ञान तो दिया, लेकिन विज्ञान ने हाथ में बारूद थमा दिया। मध्यकाल तक आते-आते युद्धों ने विचारधाराओं और धर्मों का लबादा ओढ़ लिया। मनुष्य महलों में रहने लगा, रेशमी वस्त्र पहनने लगा, लेकिन उसके भीतर का शिकारी कभी भी शांत नहीं हुआ। औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया तो देशों की भूख भी बढ़ गई, जिसका भयावह परिणाम हमने हिरोशिमा-नागासाकी के परमाणु विस्फोट के रूप में देखा। परमाणु शक्ति जो ऊर्जा का अनंत स्रोत बन सकती थी, वह मानवता के लिए सबसे बड़ा भय बन गई।

आज हम जिस आधुनिक युग में खड़े हैं, वहां युद्ध का बदला हुआ स्वरूप हम देख रहे हैं। अब केवल सीमाओं पर गोलियां नहीं चलतीं, बल्कि आर्थिक और साइबर युद्ध के माध्यम से पूरे राष्ट्र को पंगु बनाने की चेष्टा की जाती है। गाजा और यूक्रेन के वर्तमान संकट इस बात का प्रमाण हैं कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं आज सर्वाधिक अशक्त और पंगु जान पड़ती हैं। अतः अब समय आ गया है कि राष्ट्रों के सामूहिक संगठन को एक नए सहभागी लोकतांत्रिक ढांचे में ढाला जाए। हमें ऐसी वैश्विक व्यवस्था की नींव रखनी होगी जहाँ 'युद्धक विनाश' को एक गंभीर 'सामाजिक अपराध' माना जाए। वैज्ञानिक अनुसंधान किसी एक देश की सामरिक श्रेष्ठता के बजाय मानवता की सामूहिक ताकत बनें। यदि विश्व के सैन्य खर्चों में तर्कसंगत कटौती कर वह विपुल धनराशि वैश्विक गरीबी और भुखमरी दूर करने में लगाई जाए, तो ही सभ्यता का असली उत्कर्ष होगा।

विकास की वास्तविक साहित्यिक और मानवीय शाश्वत अवधारणा वही हो सकती है, जिसकी परिकल्पना तुलसीदास जी ने 'रामराज्य' के रूप में की थी, जहाँ दैहिक, दैविक और भौतिक ताप न हों। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विकास का अर्थ केवल ऊंचे भवन और तेज रफ्तार गाड़ियां नहीं, बल्कि एक ऐसा संवेदनशील समाज होना चाहिए जहाँ विज्ञान का उपयोग घाव भरने के लिए हो, न कि नए जख्म देने के लिए। भारत जब एक विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, तो हमारा नेतृत्व विश्व को ज्ञान और करुणा का वह दीप दिखाए जो युद्ध की विभीषिका को सदा के लिए शांत कर दे।

अंततः हमें यह समझना होगा कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। सभ्यता की मशाल को प्रज्वलित रखने के लिए शांति की मंद बयार चाहिए, न कि नफरत का तूफान। मानवीय सभ्यता का वास्तविक उत्कर्ष तभी संभव है जब हमारी बुद्धि और हृदय के बीच संतुलन हो। भविष्य की राहें तभी प्रशस्त होंगी जब हम शस्त्रों के मोह को त्यागकर शास्त्र और संवेदना के मार्ग पर चलेंगे। मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना ही विकास की अंतिम मंजिल होनी चाहिए।

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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