काव्य :
ननिहाल
बाल-विधा
नानी मेरी प्यारी प्यारी, ननिहाल भी प्यारा है।
नानी का घर मुझे स्वर्ग से भी प्यारा है।
हरे भरे खेत और नदी का किनारा है।
ठंडी ठंडी शीतल निर्मल, जल की धारा है।
घर के आँगन में, नीमकी छाया है।
जीवन का आनंद बस, यही हमने पाया है।
आम के बागों में, कोयल कूक रही है।
मोर भी बहुत से, नाचते दीख रहे है।
नदी में डुबकी लगाकर सुबह जब हम आते है।
दूध का प्याला, नानी हमें देती है।
धवला गाय का दूध बडा मीठा है।
दोपहर के खाने में, दही का कटोरा है।
मक्के की रोटी पर, मक्खन का गोला है।
जीवन का आनंद बस यहीं हमने पाया है।
आँगन में नीम के, झूला डला है।
झूले पे बैठकर, नभ को छुआ है।
जीवन का आनंद बस यहीं हमने पाया है।
बैलगाडी की सैर, नाना हमें कराते है।
नाव में बैठकर खुशी हम पाते है।
रात में नानी हमें, कहानियॉ सुनाती है।
हमारे साथ बैठ कर, पहेलिया बुझाती है।
छुटि्ट बिताकर, जब घर हम लौटते है।
बहुत सारी सौगात, नानी हमें देती है।
नानी मेरी प्यारी प्यारी, ननिहाल भी प्यारा है।
नानी का घर मुझे, स्वर्ग से भी प्यारा है।
- श्रीमति आरती चौगुले , पुणे
(मो.नं. 9850960735)
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