काव्य :
|| विदा ||
वो जन्मी निःशब्द निर्विकार मुद्रा, थी उसकी उस दिन|
उसे छेड़ा तो कुनमुनाई, क्यों छेड़ते हो कहाँ मैं आई |
फिर छेड़ा तो चीत्कार उठी, धीरे धीरे सीखी मुस्कान रूठा रूठी|
वो दौडी रुकी फिर दौडी, छुआ आसमान पूरे पूरे जोर पर|
बेटी ब्याहे अच्छा लगता है, सपन सजाये अच्छा लगता है|
कैसे बीतेगा जीवन एकाकी, उनको उसकी ज़रा की चिंता थी|
मात पिता की चिंता देवा ओ देवा, उसका सपना मानव सेवा|
हंस देती पापा साथ तुम्हारे हूँ, माथा न पीरे माँ इतना सुख दूं|
पर नियति ने कुछ खेल रचा ऐसा, कभी नाहीं सोचा जैसा था|
पिता पुत्र के काँधे जाए होता है, पुत्र पिता के काँधे पिता अभागा होता है|
कुछ ऐसा ही था उस दिन जब वह चिरनिद्रा में सोई थी|
कितना छेड़ा उसको पर वह न कुनमुनाई न रोई थी|,
अग्नि दाह दिया तब भी खामोश, वो ललना न रोई थी|
चीत्कार उठा दग्ध ह्रदय पिता, माँ फूट-फूट कर रोई थी|
जाओ इस जीवन तो भूल न पायेंगे तुमको|
तिल तिल कर ही जीना हमको, तिल तिल ही मरना हमको|
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- डॉ गिरिजेश सक्सेना, भोपाल
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