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काव्य : विदा - डॉ गिरिजेश सक्सेना, भोपाल


 

काव्य : 

||  विदा ||

वो जन्मी निःशब्द निर्विकार मुद्रा, थी उसकी उस दिन|

उसे छेड़ा तो कुनमुनाई, क्यों छेड़ते हो कहाँ मैं आई |

फिर छेड़ा तो चीत्कार उठी, धीरे धीरे सीखी मुस्कान रूठा रूठी|

वो दौडी रुकी फिर दौडी, छुआ आसमान पूरे पूरे जोर पर|

बेटी ब्याहे अच्छा लगता है, सपन सजाये अच्छा लगता है|

कैसे बीतेगा जीवन एकाकी, उनको उसकी ज़रा की चिंता थी|

मात पिता  की चिंता देवा ओ देवा, उसका सपना मानव सेवा|

हंस देती पापा साथ तुम्हारे हूँ, माथा न पीरे माँ इतना सुख दूं|

पर नियति ने कुछ खेल रचा ऐसा, कभी नाहीं सोचा जैसा था|

पिता पुत्र के काँधे जाए होता है, पुत्र पिता के काँधे पिता अभागा होता है|

कुछ ऐसा ही था उस दिन जब वह चिरनिद्रा में सोई थी|

कितना छेड़ा उसको पर वह न कुनमुनाई न रोई थी|, 

अग्नि दाह दिया तब भी खामोश, वो ललना न रोई थी|

चीत्कार उठा दग्ध ह्रदय पिता, माँ फूट-फूट कर रोई थी|

जाओ इस जीवन तो भूल न पायेंगे तुमको|

तिल तिल कर ही जीना हमको, तिल तिल ही मरना हमको|

*** *** ***

- डॉ गिरिजेश सक्सेना, भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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