काव्य :
आखिरी
आ गई मेरी शाम आखिरी आखिरी ।
फिर भी रह गये कुछ काम आखिरी आखिरी ।।
एक झटके से महफिल से उठना पड़ा।
कर न पाया सलाम आखिरी आखिरी ।।
छक के जीवन भर मैं को मैं पीता रहा ।
छूटा फिर भी एक जाम आखिरी आखिरी ॥
रास्ते ही मिले, मिल न मन्जिल सकी ।
पा सका ना मुकाम आखिरी आखिरी ।।
चार कन्धों पर जाता हूँ शमशान अब।
सब को अब राम राम अखिरी आखिरी ।।
- डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव
विशु नगर परासिया मार्ग छिंदवाड़ा
मध्यप्रदेश मोबाइल 9424636145
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