काव्य :
गज़ल
1
मुसीबत में कदम तेरे कभी झुकने नहीं पाएं
रखो तुम होंसला इतना कि पग रुकने नहीं पाएं
2
नदी गहरी हो चाहे और पर्वत के शिखर आएं
करो तुम पार साहस से चरन हिलने नहीं पाएं
3.
रखो धीरज समय कब एक जैसा है रहा यारो
जगे विश्वास यदि उर में तिमिर टिकने नहीं पाए
4
कपट छल द्वेष जीवन में कभी आने नहीं देना
रखो निर्मल सदा मन को कभी छलने नहीं पाए
5
बिना श्रम के नहीं तकदीर बदली है कभी राही
भले हों पांव में छाले कदम डिगने नहीं पाएं
- राजेन्द्र शर्मा राही , भोपाल
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काव्य
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