सम्पूर्ण विश्व के लिए श्रेष्ठतम अभिवादन 'जय जिनेन्द्र '
- इंजी. अरुण कुमार जैन , फरीदाबाद
सम्पूर्ण विश्व में जब भी हम सभी एक दूसरे से मिलते हैं तो अपने स्थान, संस्कृति, धर्म,भाषा,आस्था के अनुरूप अभिवादन स्वरुप कुछ शब्द अवश्य कहते हैं.
आज की नई पीढ़ी आधुनिकता के संस्कारों वश हेलो, हाय कहने लगे हैं जिनका कोई सार्थक अर्थ नहीं है,इसके पूर्व हम सभी आपस में मिलने पर,नमस्कार, प्रणाम, नमस्ते, गुडमॉर्निंग, गुड इवनिंग आदि अभिवादन करते थे, जो उस समय बिशेष को अच्छा होने की भावना व्यक्त करते थे.
जब भाषा के अनुसार अभिवादन करते हैं तो सभी अपने देश, प्रान्त या क्षेत्र की भाषा में, अपनी स्थानीय, भाषा की संस्कृति के अनुसार अभिवादन करते हैं, और जब धर्म के अनुसार अभिवादन करते हैं तो हिन्दू धर्म के अनुसार जयराम जी, राधे राधे, जय महाकाल, जय गुरुदेव, नमाय शिवाय, जय श्री कृष्णा, राम राम आदि अभिवादन होते हैं. इन अभिवादनों में प्रभु श्री राम, श्री कृष्ण, शिव जी, सीता माँ, माँ राधा या अन्य किसी देवता बिशेष का अभिवादन हम सब करते हैं. अपने आराध्य बिशेष के आलावा अन्य किसी दूसरे देवता के प्रति हमारी श्रद्धा व्यक्त नहीं होती.
जब सिख भाई आपस में धार्मिक आस्था के अनुसार अभिवादन करते हैं तो,जो बोले सो निहाल,'सत श्री अकाल ',या वाहे गुरु जी का खालसा, बोलते हैं, जिसका अर्थ है कि वह जो मृत्यु के वश में नहीं है वही सत्य है या सच्चा है, उसको नमन.
मुसलमानो में अभिवादन करते समय 'अस्सलामु अलैकुम 'कहा जाता है, जिसका अर्थ है, आप पर अल्लाह की कृपा बनी रहे. इस अभिवादन में अन्य देवी, देवताओं के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, वैसे भी इस्लाम में अल्लाह के आलावा किसी और की बंदिगी करना मान्य नहीं है.
ईसाई भाई जब आपस में अभिवादन करते हैं तो 'जय मसीह की ' बोलते हैं, यानि प्रभु ईसा मसीह की जय हो. यहूदी भाई जब आपस में अभिवादन करते हैं तो "शालोम" शब्द का उच्चारण करते हैं, जिसका अर्थ है शांति हो.
बुद्ध धर्म में आजकल "जय भीम' कहकर अभिवादन किया जाता है जो भारत रत्न भीमराव अम्बेडकर जी के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति है, साथ ही 'नमो तस्स' कहकर भी अभिवादन करते हैं, जिसका अर्थ है मैं उस प्रभु की वंदना करता हूँ.
हमारे देश में ही कई और गुरु व पंथ हैं, जिनमें "जय गुरुदेव", जय माँ, जोहार, वंदना आदि शब्दों द्वारा एक दूसरे का अभिवादन करते हैं व अपने गुरु, धर्म, आस्था के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं.
इन सभी के साथ जब जैन भाई आपस में एक दूसरे का अभिवादन करते हैं तो " जय जिनेन्द्र "'का उच्चारण करते हैं. जिनेन्द्र का अर्थ है, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय पायी हो, उनकी जय जय कार. जिन्होंने राग, द्वेष, मोह, क्रोध, लोभ, काम, वासना, इन्द्रिय लालसा, परिग्रह आदि पर विजय पायी हो उन सभी की जय जयकार. "जयजिनेन्द्र" तीर्थकर ऋषभदेव से महावीर भगवान तक किसी एक प्रभु की वंदना नहीं है, यह अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठीयों में से किसी एक की वंदना नहीं है, किसी एक आचार्य परमेष्ठी की वंदना नहीं है, यह वंदना है, उन सभी महान आत्माओं की जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय पायी है. हम उन कोटि कोटि आत्माओं को प्रणाम करते हैं, जय जयकार करते हैं जो इस मापदंड पर विराजे हैं, वे प्रभु राम भी हैं, योगेश्वर कृष्ण भी है, वे शिव भी हैं, वे ब्रह्मा भी हैं, बुद्ध भी हैं, वे दुनियाँ के किसी भी देश, धर्म, संप्रदाय, कबीले या स्थान के हों सभी की जय जयकार. वे वाहे गुरु जी भी हैं, वे अल्लाह भी हैं, वे यीशु भी हैं, पूज्य अम्मा, देवी माँ वे सभी जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय पायी है, जो करुणावान हैं, जिनका स्मरण मात्र ही असीम शांति की अनुभूति देता है, उनको नमन.
इस नमन में वे सभी हैं जो भूख, प्यास, विश्राम, आराम, भोग, विलास, मान,अपमान, क्रोध, मोह सभी से परे हैं, प्राणिमात्र के प्रति जिनके मन में असीम करुणा है, तृन , कण, कंचन, कामिनी, स्वर्ग, सुरभि किसी की कामना जिनके मन में नहीं, वही जिनेन्द्र हैं.
हर धर्म में ईश्वर वही हैं जो सर्वशक्तिमान तो हैं ही, क्षमावान हैं, दयालु हैं, कृपालु हैं तभी तो वह जिनेन्द्र कहलाते हैं.
धन्य हैं वे सभी आत्मायें जिन्होंने अपने ऊपर विजय पायी है व मोक्ष महल में चिर स्थायी स्थान प्राप्त कर लिया है. सिद्ध शिला ही जिनका गंतव्य है.
उपरोक्त वर्णन यह प्रमाणित करता है कि" जय जिनेन्द्र" सम्पूर्ण विश्व का सर्वश्रेष्ठ अभिवादन है. यह असीमित है, अनंत है, इसमें हर उस प्रभु की वंदना है जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय पायी है, उनमें राम, कृष्ण, शिव, ईसा मसीह, बुद्ध, माँ सीता, राधा, पार्वती, गुरु नानक, अल्लाह सभी आ जाते हैं. यह अभिवादन किसी एक विभूति का नहीं, विश्व की उन समस्त दिव्य व भव्य आत्माओं का है जिन्होंने हमें संबल दिया है, जो हमारे पथ प्रदर्शक हैं, जिनके स्तवन, वंदन, नमन से हम मन वांछित पा सकते हैं या उन जैसा बन सकते हैं.
"जयजिनेन्द्र" में हमारा नमन हर उस विभूति को है जो श्रद्धा के पात्र हैं, समदृष्टि हैं, करुणावान हैं, क्षमाशील हैं,
जय जिनेन्द्र में सारे विश्व की दिव्य आत्माओं की जय जयकार है व अपने आप को उन जैसा बनाने का संकल्प है.
हम सभी भाग्यशाली हैं कि हम सभी के पास एक ऐसा अभिवादन मंत्र है जिसके उच्चारण से विश्व की सभी श्रेष्ठतम आत्माओं का जय जयकार होता है, तो आइये हम सभी किसी भी जाति, धर्म, पंथ के हों, किसी भी देश, प्रदेश के हों, किसी भी भाषा, संस्कृति के हों सभी प्रेम, श्रद्धा व आस्था से बोलें "जय जिनेन्द्र "व असीम पुण्य का वर्धन करें. जय जिनेन्द्र बोलकर अनेकता में एकता, विश्व मैत्री, विश्व अनुराग का परिचय दें व धरा को वन्दनीय बनायें.
,.आइए मात्र एक उदबोधन से विश्व की अनंत महान विभूतियों को नमन करें, सदा ही प्रेम, श्रद्धा, अनुराग, आस्था से बोलें "जय जिनेन्द्र ".
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