काव्य :
समय का परिवर्तन
बाल्यकाल में स्वभाव हमारा
अत्यंत उग्र और चंचल था,
तुच्छ प्रसंगों पर भी क्रोध
मानो स्वभाव का ही अंश था।
वाणी में तीक्ष्णता रहती थी,
मन में अथाह अभिमान था,
क्षणिक विवादों को ही हमने
जीवन का प्रतिमान माना था।
किन्तु कालचक्र के परिवर्तन संग
जब आयु का विस्तार हुआ,
अंतरमन का कोलाहल शांत हुआ,
और विचारों में गंभीरता का संचार हुआ।
अब न व्यर्थ के संघर्ष भाते हैं,
न तर्कों का आकर्षण शेष रहा,
जीवन ने अनुभवों की अग्नि में
मन को संयमित कर दिया।
जो बालपन में प्रचंड था,
वह अब मौन का आभूषण है,
क्योंकि परिपक्वता सिखा देती है —
शांत रहना भी एक साधना है।
- हिमांशु त्रिपाठी , दिल्ली
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