शोकगीत जो मांगलिक अवसरों पर गाये गये
- पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर
लोकगीत हमारी संस्कृति कै प्राण होते हैं।समाज की तमाम वर्जनाओं,परंपरागत जीवन मूल्यों के संरक्षक भी। इन लोकगीतोः में समाज की ,जीवन की आत्मा बसती है।इतिहास हो या वर्तमान सभी का एक स्वच्छ दर्पण हैं ये लोकगीत। मुझे मांगलिक अवसरो पर गाये जानेवाले लोकगीत बहुत पसंद हैं,उनकी सहजता और मार्मिकता मन को छूती है।ऐसे ही लोकगीतोः में एक.विधा है.सोहर।जिसे पुत्र या पुत्री जन्म पर गाया जाता है।जिसके नायक मुख्य रूप से राम और कृष्ण हैं जिनकी जन्म से लेकर बाल क्रीडाओं तक के प्रसंग इनके केंद्र विषय हैं। विशेष रुप से जब तुलसीदास कृत रामलला नहछू के गीतों को सुनें तो मन का आनंद उल्लास उसी वात्सल्य रस में डूब जाता है जो कभी दशरथ और कौशल्या के मन की आनंद अवस्था रही होगी। ऐसा ही एक लोकगीत जो मेरे मन प्राणों को इस तरह घेर लेता है कि मन उस वेदना या उसकी भावप्रवण अनुभूतियों को.महसूस कर उस से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। प्रसंग उल्लास का है ,सारी अयोध्या खुशियों में झूम रसी है।राम का जन्म हुआ और जन्मोत्सव की खुशियां मनायी जा रही हैं। अयोध्या के घने वन में पेड के नीचे एक हरिणी न जाने क्यों उदास हो अनमनी सी खडी है।आंखें भींगी हैं,आसन्न संकट की आशंका से वह बहुत व्यग्र और विचलित है।
छापक पेड छिउलिया त पतवन वन झरे हो
ए ललना ताहि तर ठाडि हरिनिया त हरिना बिसोचइ हो। वह हरिण के विषय में सोच रही है जिसे आज राम की छठी.के उत्सव में भोज के लिए मार डाला जायेगा।
प्रसिद्धि लोकगायिका मालिनी अवस्थी जी ने अपनी पुस्तक चंदन किवाड में इस सोहर गीत का उल्लेख किया है। हिरण अपनी प्रिया हरिणी से पूछता है कि तुम इतनी अनमनी उदास क्यों हो? उसका उत्तर सुनकर वह भी व्यथित हो जाता है।मां कौशल्या आसन पर बैठी.हैं ,उल्लास की.बधाई बज रही है और उसका हरिण अभी तक घर लौटकर नहीं आया। वह समझ जाती है कि अनर्थ हो गया। उनकी पुस्तक "चंदन किवाड़" में एक अध्याय इसी कालजयी सोहर को समर्पित है।-डा मालिनी अवस्थी लिखती हैं -
भारत की लोकसंस्कृति की आत्मा में राम रमते हैं अतः यहां कथा का संदेश देने के लिए राम जन्म निमित्त बना है। यह सोहर हिरनी के शोक की कथा है, अपने प्रिय को खो देने के बाद वियोग की उमड़ती भावनाओं की असमाप्त श्रृंखला की कथा है। संवेदनाओं के झंझावात में अंतर्मन को झकझोर देने वाली व्यथा की कथा है। लोक हिरनी की कथा को कह रहा है संसार सुन रहा है, यह जिज्ञासा उठ सकती है कि गीत में नायक हिरण क्यों नहीं, हिरनी ही क्यों, उसका उत्तर इसी में निहित है क्योंकि सोहर स्त्रियों ने रचे, पुरुषों ने नहीं। इस सोहर गीत को स्त्रियों ने ही अपनी अपनी पीड़ा से सींचा है इसीलिए नायिका हरिणी है, हिरनी की पीडा एक स्त्री की पीडा है जिसे दशरथ से नहीं एक स्त्री से ही अर्थात कौशल्या से करुणा की अपेक्षा है, शायद वह हिरनी के दुख को अनुभूत कर सके। वह रानी से कहती है कि हरिण का मांस तो आपकी रसोई में पक रहा है मुझे खाल ही दे दें।उसे जब पेड पर टांग दूंगी तो उसके हिलने डालने से ऐसा लगेगा जैसे मेरा हरिण जीवित है।
पेड़वा से टांगबी खलरिया त मनवा समुझाइबि हो,रानी हिरि-फिरि देखबि खलरिया जनुक हरिना जिअतहिं हो।
जाहू! हरिनी घर अपना खलरिया ना देइबि हो,हरिनी खलरी के खंझड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहें नू हो।
परंतु कौशलया मना कर देती हैं।एक तो पुत्र जन्म की खुशी ,दूसरे वृद्धावस्था में मां बनने का उल्लास, उन्हें पुत्र मोह घेर लेता है।वह तो अपनी खुशी में मगन हैं।नहीं हरिणी,खाल तो मैं नहीं दूंगी इससे खंजडी मढाऊंगी जिसे बजा बजाकर मेरे राम खेलेंगे। यहां पर करुण रस अपनी चरमावस्था पर है करुण रसधारा बह.रही है।हरिणी उदास है।
जब-जब बाजेला खंजड़िया सबद सुनि अहंकेली हो,हरिनी ठाढ़ि अररिया के नीचे हरिन बिसूरेली हो.
इस गीत के भाव उस घटना की भी याद दिलाते.हैं जब क्रौच नर पक्षी के.व्याध द्वारा मार दिये जाने पर महर्षि वाल्मकि के.मुख से भी कविता की धारा फूटी थी-
ना निषाद प्रतिष्ठात्वम अगम: शाश्वती समा:
यत्करौंच मिथुनादेकं अवधी काम मोहिता;।
इस गीत को आदरणीय छन्नुलाल मिश्र जैसे कलाकारों ने भी गाया है और विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वानों ने इसकी व्याख्या की है, यह एक बहुत ही लोकप्रिय और भावनात्मक सोहर गीत है। लोक जो कहता है ,बुनता है वह सहज रुप से मार्मिक है। किसी विशेष प्रसंग को साधारण भाव में परिवर्तित कर सुख दुख की गहन अनुभूतियों को जोड़कर देता है और उस भाव का साधारणीकरण होकर पाठक या श्रोता के.मन में सीधे सीधे प्रवेश कर.लेता है। जिसे.सहज भाव से शास्त्र पुराण आदि भी नहीं व्यक्त कर पाते उसे लोक आसानी से ग्रहण कर गाता है ,अनुभूत करता है और उसी भाव प्रवाह में बह निकलता है। यह प्रचलित अवधी लोकगीत मंगल अवसरों पर गाया जाता है.सोहर के रुप.में।यह विरह भी है, सत्ता की निष्ठुरता की पराकाष्ठा भी. यह राम के बालपन से जुड़ा प्रसंग है. कवि-लेखक बोधिसत्व ने इसे कविता में बुनते हुए इसकी मार्मिकता में वृद्धि की है और इसकी संवेदना को और नुकीला बनाया है, कुछ इस तरह की यह कविता मर्म को विदीर्ण करती चलती है.
उनकी कविता *हिरणी का विनय पत्र* इसी अवधी के सोहर गीत से प्रेरित है।
दशरथ ने राम को एक ढपली दी है
हिरण के चमड़े से मढ़ी
चंदन के काठ की बनी
सोने की छोटी छोटी घंटियां लगी हैं उसमें!
राम वह ढपली बजाते हुए खेल रहे हैं!
वह ढपली राम का प्रिय खिलौना है!
वन जहां से मार कर उस हिरण को
लाए थे दशरथ
जिसका चमड़ा सिझा कर
मढ़ा गया ढपली पर
राज कुंवर राम के लिए!
किसी लोकगीत का काव्य रूपांतरण सरल महीं होता।परंतु इस कविता ने समाज की आत्मा को छुआ है।
इस गीत की मार्मिकता सर्वव्यापी है। एक साक्षात्कार में वरिष्ठ साहित्यकार विद्या बिन्दु जी को सुना है.मैने। वह इस गीत की मार्मिकता में निहित नारी की पीड़ा और वेदना को हृदय से महसूस करती हैं।उनका कहना था कि अवधी साहित्य तो केवल हरिणी की व्यथा सुनकर मौन.हो जाता है परंतु भोजपुरी लोकगीतों में हरिणी ने भी रानी को श्राप दिया था कि जिस तरह मैं अपने हरिण से बिछुडी आप भी राम वनवास के बाद अपने राजा से बिछुड जायेंगी। सत्व क्या है,सक्षम नहीं होता।आदरणीय विद्यानिवास मिश्र द्वारा सम्पादित कृति "वाचिक कविता भोजपुरी" में कहा गया है
यह बहुत ही मशहूर सोहर है, हरिणी से हरिण एक प्रश्न पूछता है की वह उदास क्यों हैं। हरिणी उत्तर दे रही है कि आज कोसल नरेश के यहाँ छठीहार है और हरिण को छट्ठी के लिए मार डाला जाएगा। बाद में हरिणी और कौसल्या का संवाद है जहाँ हरिणी रानी से हरिण की खाल मांगती है जिससे वह उसे याद के रूप में अपने पास रख सके लेकिन कौसल्या ने यह कहते हुए की उसकी खाल से खंजड़ी बनाई जायेगी जिससे उनका लाल राम उससे खेल सके हरिणी को निराश होकर लौटना पड़ा। और जब-जब खंजड़ी बजती है हरिणी के मन में टीस उठती है)
भोजपुरी और अवधी लोकगीतों में ऐसे कई शोकगीत भी हैं जिन् मांगलिक अवसरों पर या शिशु जन्मोत्सव पर गाया जाता है।वैसी स्त्री जो संतान से.वंचित है और चाहकर भी जो मां नहीं बन.सकी वह अपनी पीडा लोक से वपक्त करती है और गांव में कहीं भी बधाई के गीत या.वाद्य के.स्वर सुनना भी नहीं चाहती।
जनि कहीं नगर बधइया बाजे अहीर गैया जनि दुहाई हे
हे ललना,जनि कहीं.बेटवा बियास,सोहर हम नाही सुनब हे।..इतनी पीडा और वेदना के साथ जीवन कितना दूभर लगता है.इसका दुख एक स्त्री ही समझ.सकती है। कभी वह समाज से.परिजनो से अपना दुख कहती.है तो कभी गंगा मैया से।परिवार समाज के तानों से दुखी होकर वह गंगा जी से अपनी मृत्यु की याचना करती है-
नाही मोर सास ननद दुख नाहि रे सुजन दुख हे
नाही मोर कंत विदेश, कोखी ए दुख रोवेली हो।
हे गंगा मैया अपनी लहरिया हमें देतिउ त डूबि धंसि जइति नु हो।
आज समाज भले ही बदल गया हो।विज्ञान की ऊंचाईयोः को छूने वाला समाज आज भी अपने परिवेश की विकृतियों को भुला नहीं पाया। किसी संतानहीना स्त्री का दुख आज.भी सामाजिक तानों के दायरों में छटपटाता ही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए लोग आज भी निरीह लोक के प्रति उतने संवेदनशील नहीं हैं।अत; इन ग्राम्य लोकगीतों की पीडा शोकगीत ही बनकर रह जाती है।दुख और वेदना चाहे मूक हरिणी की हो या सामान्य नारी की दर्द उनका समान ही है। आज भी नारी अपनी पीडा, अपना दुख सहजता सै नहीं व्यक्त कर पाती। फिर वर्षों पूर्व से लेकर आज के परिवेश में भी जितने आंसू उसने अपने जीवन में रोपे हैं उनका प्रस्फुटन इन गीतों के रुप में ही होता है। जो.व्यथा कथा सार्वजनिक नहीं हो पाती उसे गेयता भूलीं भांति अभिव्यक्त कर देती.है।सखियों से बेबाक बातचीत, सास ननद के ताने उलाहने सामाजिक वर्जनाओं ,मन में उमडता स्नेह दुलार सभी इन लोकगीतों के प्रमुख विषय होते.हैं।
पाश्चात्य विचारक विलियम्स ने लोकगीतों के विषय में कहा है-
लोकगीत न पुराना होता है न नया।
वह जंगल के एक वृक्ष के समान है
जिसकी जड़ें भीतर तक धरती में
धंसी हुई है पर जिसमें निरंतर नई
नई डालियां पल्लव और फल फूल रहते हैं।
वह गीत जो लोक मानस की अभिव्यक्ति हो अथवा जिनमें लोकमानस भाव भी हो लोकगीत के अंतर्गत आता है।
रामनरेश त्रिपाठी ने तो लोकगीतों को ग्राम्यगीत कहा है।ग्रामगीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं केवल लय है, लालित्य नहीं केवल माधुरी है। सभी मनुष्य अर्थात स्त्री पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति गान करती है, प्रकृति के ही समान ग्राम्य गीत हैं।
लोकगीतों में ढले शोकगीतों के विषय में हीरामणी सिंह साथी ने कहा है कि- लोकगीत जनमानस की कोख से उपजे धरती के गीत है जिनमें बांसुरी का आकर्षण भी है और बीन का मिठास भी पुरवैया की मादकता भी है,और करुणा की मार्मिक पुकार भी है और चीत्कार भी।नारी कंठों का इंद्रजाल भी है । इसकी बीन में एक युग बोलता है एक व्यवस्था बोलती है और एक अनुशासित समाज बोलता है इनमें पीड़ा भी है, उल्लास भी है, अपमान भी है और प्रेम समर्पण का विस्तार भी है, जहाँ एक व्यक्ति की बोली बन जाती है। सचमुच इन गीतों का संरक्षण एक धरोहर, एक विरासत की तरह होना चाहिए। ये शोकगीत हमारी संस्कृति का.स्वच्छ व निर्मल दर्पण हैं जिसमें तत्कालीन समाज अपना स्वरूप देख सकता है।
- पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
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