काव्य :
संघर्षों के बीच उम्मीदों का रथ
सुख-दुःख की आँख-मिचौली
कठिन परीक्षा होती,
लगता है जैसे बचपन बीता
और फिर जीने की इच्छा होती।
कल तक जो सपनों में खोया,
आज समय से लड़ता है,
मासूम हँसी का हर मोती
जिम्मेदारियों में बिखरता है।
बनती नहीं ये बात भला,
बचपन बन जाता है कैदी,
परिस्थितियों का गहरा सागर
होता कितना मुस्तैदी।
कभी अभावों की तपती धूप,
कभी निराशा की काली रात,
मन के भीतर उठते रहते
अनगिन सवालों के जज़्बात।
पर मैं भी हूँ तनकर खड़ी
बाधाओं के हर पथ में,
हार नहीं मानूँगी यूँ ही,
बैठी हूँ उम्मीदों के रथ में।
टूटे सपनों की किरचों से
मैं फिर राह बनाऊँगी,
अंधियारे के हर कोने में
अपना दीप जलाऊँगी।
आकांक्षाओं की आस बड़ी
लम्बी है भू-रण में,
पाकर भी अधूरा रहता
पोषण जीवन-भरण में।
फिर भी मन ये कहता मुझसे —
रुकना तेरा काम नहीं,
संघर्षों से डरकर जीना
मानव का पहचान नहीं।
जो गिरकर फिर उठ जाते हैं,
वे ही इतिहास बनाते हैं,
सूखे पत्तों की शाखों पर भी
नव जीवन के फूल खिलाते हैं।
एक दिवस ऐसा आएगा,
मेहनत रंग दिखाएगी,
मेरे सपनों की हर चिंगारी
पूर्ण ज्योति बन जाएगी।
- प्रियंका कुमारी , जमशेदपुर
.jpg)
