काव्य :
बीच राह में
बीच राह में
छोड़कर जाने वाले
लौटकर फिर ना
आने वाले
मुझको कर गया
तन्हाइयों के हवाले,
छोड़-छोड़
लहरें जा रहीं
चाँद भी गमगुसार
ना रहा
बस बदलियाँ चंद
साथ हैं मेरे
कुछ दिल में कुछ
नयनों में
ठहरे
दूर तलक बस
तन्हाइयों के डेरे।
हम तो उतरे
इश्क के दरिया में
पूर्ण आश्वासित
तेरी बाँहें थाम कर,
बीच भँवर में
हाथ झटक कर
चल दिया
बिन मुख मोड़े,
मैं बिरहिन तटपर बैठी
टूटे दिल के टूकड़े
लेकर
कब आएगा लौटकर
बीच राह में
छोड़कर जाने वाले।
तन-मन से
था तुझको अपनाया
हर सपने में तुझे
सजाया
साँसों में महकी
तेरी साँसें थीं
धड़कन की ताल
बस तेरे गीत ही
गाती थी,
सपनों को पैरों तले
कुचलकर
रुह को मेरी जख्मी
करके
कब आएगा लौटकर
बीच राह में
छोड़कर जाने वाले।
- डा.नीलम ,अजमेर
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