आलेख :
हर इंसान रिश्तों से परेशान - रिश्तों में ज़हर घोलती आदतें : प्यार कम नहीं हुआ, समझ कम हो गई
"दादी, आप नाराज़ हैं क्या?"
दस साल की पोती ने पूछा तो दादी ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन आँखों की नमी छिपा नहीं पाईं।
"नहीं बेटा, नाराज़ नहीं हूँ।"
"फिर आप चुप क्यों रहती हैं?"
दादी ने धीरे से कहा, "कभी-कभी घर में सब लोग साथ होते हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं होता।"
बच्ची कुछ समझी, कुछ नहीं समझी। लेकिन उस छोटे से सवाल ने एक बड़ी सच्चाई सामने ला दी। आज अधिकांश लोग अपनों के बीच रहते हुए भी भीतर से अकेले हैं। रिश्ते हैं, लोग हैं, बातचीत भी है, लेकिन मनों के बीच कहीं एक दूरी आ गई है।
यदि हम अपने आसपास देखें तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो यह न कहता हो कि वह किसी न किसी रिश्ते से परेशान है। कोई जीवनसाथी से दुखी है, कोई बच्चों से, कोई माता-पिता से, तो कोई मित्रों से। ऐसा लगता है जैसे रिश्ते अब सुकून देने के बजाय तनाव देने लगे हैं।
लेकिन क्या सचमुच रिश्ते समस्या हैं?
शायद नहीं।
समस्या उन आदतों में है जो धीरे-धीरे रिश्तों की मिठास को खा जाती हैं।
पुराने समय में लोगों के पास संसाधन कम थे, लेकिन रिश्तों में धैर्य अधिक था। एक ही आँगन में कई पीढ़ियाँ रहती थीं। मतभेद होते थे, लेकिन मनभेद कम होते थे। आज घर बड़े हो गए हैं, कमरों की संख्या बढ़ गई है, लेकिन दिलों के बीच की जगह कहीं सिकुड़ गई है।
रिश्तों में सबसे बड़ा ज़हर घोलती है - ताने देने की आदत।
कई लोगों को इसका एहसास भी नहीं होता। वे सोचते हैं कि वे सिर्फ मज़ाक कर रहे हैं या अपनी नाराज़गी जता रहे हैं। लेकिन शब्दों का असर बहुत गहरा होता है।
"तुमसे कभी कोई काम ठीक नहीं होता।"
"तुम हमेशा ऐसा ही करते हो।"
"तुम्हें किसी की परवाह ही नहीं।"
ऐसे वाक्य सुनने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन वे सामने वाले के आत्मसम्मान पर लगातार चोट करते रहते हैं।
तलवार का घाव समय के साथ भर जाता है, लेकिन अपनों के कहे हुए कड़वे शब्द कई बार वर्षों तक भीतर चुभते रहते हैं। यही कारण है कि कई रिश्तों में लोग एक-दूसरे से बात तो करते हैं, लेकिन दिल से जुड़ नहीं पाते।
एक और आदत जो रिश्तों को खोखला करती है, वह है दूसरों को बदलने की जिद।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि यदि सामने वाला हमारी पसंद के अनुसार व्यवहार करने लगे तो सब ठीक हो जाएगा। पति चाहता है कि पत्नी उसकी सोच के अनुसार चले। पत्नी चाहती है कि पति उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरे। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे उनके सपनों के अनुसार जीवन जिएँ।
लेकिन जीवन कोई मिट्टी का खिलौना नहीं है जिसे अपनी इच्छा से नया आकार दिया जा सके।
हर व्यक्ति अपने अनुभवों, संस्कारों और संघर्षों का परिणाम होता है। जब हम किसी को बदलने की कोशिश करते हैं, तो अनजाने में यह संदेश देते हैं कि वह जैसा है, वैसा हमें स्वीकार नहीं है।
यहीं से दूरी शुरू होती है।
प्रेम का अर्थ नियंत्रण नहीं, स्वीकार्यता है।
रिश्तों में एक और बड़ी भूल हम तब करते हैं जब अनुरोध और अधिकार के बीच का अंतर भूल जाते हैं।
"क्या तुम मेरे साथ थोड़ा समय बिताओगे?"
और
"तुम्हें मेरे साथ समय बिताना ही होगा" - दोनों वाक्यों में जमीन-आसमान का अंतर है।
पहले वाक्य में सम्मान है।
दूसरे में दबाव।
जब रिश्ते दबाव पर टिकने लगते हैं तो उनमें घुटन पैदा होने लगती है। कोई भी इंसान हमेशा नियंत्रित होकर नहीं जी सकता। उसे अपने हिस्से की स्वतंत्रता और सम्मान चाहिए।
इसीलिए स्वस्थ रिश्तों में सीमाएँ भी जरूरी होती हैं। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि हम किसी की निजी दुनिया में पूरी तरह प्रवेश कर जाएँ। हर व्यक्ति को अपने विचारों, पसंदों और भावनाओं के लिए थोड़ी जगह चाहिए।
आज के समय में एक और समस्या तेजी से बढ़ी है - तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत।
किसी ने कुछ कहा नहीं कि जवाब तैयार।
किसी ने नाराज़ किया नहीं कि बहस शुरू।
सोशल मीडिया ने हमें तेज़ बना दिया है, लेकिन शायद धैर्य कम कर दिया है।
जब भावनाएँ उफान पर हों, तब बोले गए शब्द अक्सर रिश्तों में ऐसी गांठें बाँध देते हैं जिन्हें खोलने में वर्षों लग जाते हैं।
कई बार रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि समस्या बहुत बड़ी थी। वे इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि किसी ने समय रहते चुप रहना नहीं सीखा।
मौन हमेशा कमजोरी नहीं होता। कई बार यह रिश्ते को बचाने की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।
रिश्तों को सुधारने की शुरुआत भी बाहर से नहीं, भीतर से होती है।
जब कोई हमें दुख पहुँचाता है, तो हमारा पहला ध्यान उसकी गलती पर जाता है। लेकिन आत्ममंथन हमें अपने हिस्से की जिम्मेदारी भी दिखाता है। क्या हमारी अपेक्षाएँ बहुत अधिक थीं? क्या हम सामने वाले को समझने की कोशिश कर रहे थे? क्या हम केवल सुने जाना चाहते थे या सुनना भी जानते थे?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं होते, लेकिन इन्हीं में रिश्तों की मरम्मत छिपी होती है।
सच तो यह है कि हर इंसान अपने भीतर किसी न किसी दर्द, डर या संघर्ष को लेकर जी रहा है। जो व्यक्ति हमें कठोर दिखाई देता है, वह भी शायद किसी अनकहे घाव से गुजर रहा हो। यह समझ विकसित होते ही हमारे भीतर करुणा जन्म लेने लगती है।
और जहाँ करुणा आ जाती है, वहाँ शिकायतें धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।
रिश्ते कभी भी पूर्ण नहीं होते। उनमें मतभेद होंगे, गलतफहमियाँ होंगी, कभी-कभी दूरी भी आएगी। लेकिन यदि सम्मान बचा रहे, संवाद बना रहे और दिल में थोड़ी उदारता बची रहे, तो बहुत कुछ संभल सकता है।
शायद रिश्तों को बचाने का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि हम दूसरों को बदलने से पहले खुद को देखें।
अपने शब्दों को थोड़ा नरम करें।
अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा कम करें।
अपनी समझ को थोड़ा बड़ा करें।
फिर देखिए, वही रिश्ते जो आज बोझ लग रहे हैं, कल जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।
क्योंकि अंत में इंसान को याद न उसकी सफलताएँ रहती हैं, न उसकी बहसें।
याद रहते हैं तो वे लोग, जिन्होंने कठिन समय में उसका हाथ थामा था।
और रिश्ते तभी मधुर बनते हैं, जब हम जीतने की जगह समझने का प्रयास करते हैं।
--डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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