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व्यंग्य: ठोकर खाने की चीज है सीखने की नहीं - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल


 

व्यंग्य: 

ठोकर खाने की चीज है सीखने की नहीं 

 -  देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल

                  हिंदी साहित्य में यह कहावत काफी लोकप्रिय है कि, "व्यक्ति ठोकर खाकर ठाकुर बन जाते हैं ।" किंतु वर्तमान में तो इतनी ठोकरें लग रही हैं कि हमने उन ठोकरों से सीखना ही बंद कर दिया है । दूसरी बात, लगता है कि ठोकर खाने की आदत ही बन गई है । दूसरे शब्दों में कहें तो ठोकरों से अब सबक सीखने का समय जा चुका है, क्योंकि ये ठोकरें अब हमारे जीवन-यापन का साधन बनती जा रही हैं। इसीलिए, कहीं विद्युत से होने वाले शॉर्ट-सर्किट से आग लगती है तो हमें कोई दुःख नहीं होता, क्योंकि हमें मालूम है कि हमने सही ढंग से विद्युत का कनेक्शन ही नहीं करवाया था । यह तो मकान, दुकान, लॉज और रेस्टोरेंट आदि की बात है; हमने तो यही स्थिति अस्पतालों में भी देखी है । जहाँ I.C.U. अर्थात 'गहन चिकित्सा इकाई' में भी अस्पताल प्रबंधन ठीक से ध्यान नहीं देता है । इस संदर्भ में, कभी-कभी बाल गहन चिकित्सा इकाई में शॉर्ट-सर्किट से लगी आग में नवजात बच्चों के झुलसने के समाचार पढ़े और सुने हैं । वे बेचारे नवजात, जिन्हें अभी इस दुनिया में आए हुए दो-चार दिन ही हुए हैं, वे ठोकर खाने को मजबूर हैं ! फिर ऐसी घटनाएँ एकाध बार को छोड़कर बार-बार घटें, तो लगता है कि हमने ठोकर खाकर सीखना ही छोड़ दिया है । हमें पता भी था कि कभी भी आग लग सकती है, जिससे थोड़ा माल का और बहुत जान का नुकसान होगा । रही बात आदमियों की, तो वे मरेंगे ही; और मरेंगे तो जनसंख्या कम तो होगी! अभी तक हमने बिजली विभाग से विद्युत चोरी करके जो पैसा कमाया है, उसके आगे यह नुकसान बहुत कम है । हम तो इसी बचत से न केवल स्वयं लाभ में रहे, बल्कि इसका थोड़ा सा हिस्सा ऊपर भी पहुँचाते रहे । अब शॉर्ट-सर्किट से आग लग गई है, तो हमें पता है कि कैसे कागजी घोड़े दौड़ाकर सरकारी खजाने से मुआवजे की भी पूरी भरपाई कर लेंगे । पता नहीं, यह मुहावरा गढ़ने वालों को यह पता ही नहीं होगा कि ठोकरें खाने की चीज़ हैं, सीखने की नहीं। इसीलिए हमने तो मुहावरे का अर्थ ही बदल दिया है कि— 'हर ठोकर सीखने की वस्तु न होकर, खाने की वस्तु है ।' हमने ठोकर खाने के भी कई तरीके खोज निकालते हैं । इसी तरह हम अपनी यात्री बसों की भी कई सालों से मरम्मत नहीं कराते और उनसे कमाई करते रहते हैं । अब जब कोई दुर्घटना हो जाती है, तो हमें बीमा तो मिलता ही है; रही बात कानूनी कार्रवाई की, तो इससे कौन डरता है ? इसलिए 'ठोकर खाकर के भी खूब कमाओ और फिर एक हिस्सा दूसरों को खिलाओ' का सिद्धांत किसे पसंद नहीं आएगा ? अब देखिए ना, अचानक जर्जर पुलिया और पुल टूट जाते हैं, दूसरे दिन अखबारों की सुर्खियाँ बनते हैं और दो-चार दिन बाद सब भूल जाते हैं । फिर निर्माण शुरू हो जाता है । तो इस ठोकने-खाने से जहाँ हमें और अधिक खाने को मिलता है, वहीं अन्यों के लिए भी खाने-कमाने का रास्ता खुल जाता है । इस संदर्भ में, सरकारी पुलिया, पुल,सड़कें और भवन उद्घाटन के बाद, साल-दस साल में ही उनकी कितनी खस्ता हालत हो जाती है ! ताकि उसका पुनर्निर्माण किया जा सके । अब सड़क में गड्ढे होने से भले ही किसी को ठोकर लगे, लेकिन ये ठोकरें आपके कितने फायदे की होती हैं, यह किसी से छुपा नहीं है । जबकि हमारे घर की एक छोटी सी दीवार, जो बरसों खड़ी रहकर हम सबको सबक देती है कि, "देखो, मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता । यदि किसी ने मुझे ठोकर मारी, तो उसे सबक सिखाए बिना नहीं रहूँगी ।"पहले यह माना जाता था कि ठोकर खाकर बहुत कुछ सीखा जा सकता है, पर अब स्थिति बदल गयी है । अब तो ठोकर लगने के बाद और काम आएँगे । इसीलिए ठोकर खाते रहो ! हमारे यहाँ ठोकर खाकर 'खाने-खिलाने' का यह सिलसिला अब अनवरत चलने लगा है । 'ठोकर खाकर भी ठोकर खाते रहो और कमाते रहो'— यह सिद्धांत हमने शास्त्रों से ले लिया है । हम मनुष्यों में बहुत कम लोग हैं जो ठोकरें खाकर कुछ सीखते हैं; बाकी अधिकांश तो हर जन्म में वही गलतियाँ करते हैं जो पूर्व में भी की गई थीं । इसीलिए यह ठोकर खाने का चक्कर 84 लाख योनियों तक भी चलता रहता है, जबकि धर्म ग्रंथों में बार-बार हमें चेताया गया है कि मानव जीवन बड़े भाग्य से मिलता है । इसे सुधारना है तो हर ठोकर खाकर कुछ ना कुछ अवश्य सीख लो, ताकि दूसरे जन्म में दुष्परिणाम ना भोगना पड़े । पर मनुष्य है कि मानता नहीं है और:—“पुनरपि मरणं पुनरपि जननं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।”वह 84 लाख योनियों में घूमता रहता है, फिर भी कुछ सीखता नहीं है। पहले कभी इस मुहावरे का प्रयोग भगवान के लिए किया जाता था, क्योंकि भगवान अपने भक्तों को ठोकर खाने से बचाते हैं; इसीलिए उन्हें 'ठाकुर जी' कहा जाता है । दूसरे, भक्तों का भी ऐसा दृढ़ विश्वास होता है कि कभी वे ठोकर खाकर गिर भी पड़े, तो भगवान अपने हाथों से उन्हें पुनः उठा लेते हैं । अतः भक्त अपने जीवन में कई ठोकरें खाकर भी अंततः भगवान को प्राप्त कर लेता था । लेकिन आज के युग में इतनी सहनशीलता किसमें है कि भक्त केवल ठोकर ही खाता रहे ? बल्कि अब ठोकरों से भगवान पाने का नहीं, धनवान बनने का रास्ता साफ़ हो गया है ।  हम तो अब ठोकरें खाने में एक सावधानी अवश्य बरत रहे हैं कि कल जिस क्षेत्र में ठोकर खाई है, अब आज दूसरे क्षेत्र में ठोकर खाने की सोचते हैं ताकि लोगों का ध्यान बाँट सकें । ठोकर खाने से होने वाले लाभों से अब तो यह भी सोचा जाने लगा है कि आगामी समय में किस क्षेत्र में ठोकर खाई जाए, ताकि अधिक लाभ कमाया जा सके । जबकि  अन्य  देशों  में  तो  ऐसी एक घटना होने पर इतना कठोर दंड मिलता है कि लोग ठोकर खाने से ही बचते हैं, पर यहाँ अजीब हाल है ! यदि कोई ठोकर खाकर गिरता है तो देखने वाले हँसते हैं कि - 'अच्छा गिरा, अब हमारे काम आएगा, नहीं तो अकड़ के ही चलता रहता था । काश ! इन ठोकरों से लोगों ने सबक सीखा होता, तो आज स्थिति दूसरी ही होती ।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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