काव्य :
कुछ और ही होती है !
कली के रूप की महक
कुछ और ही,होती है ।।
पुष्प के यौवन की महक
कुछ और ही,होती है ।।
प्यार के सावन की महक
कुछ और ही,होती है ।।
ममता के आंचल की महक
कुछ और ही,होती है ।।
स्पर्श के सागर की महक
कुछ और ही, होती है ।।
महकता रहै,जो प्यार सदा,
जीवन में,
उस प्यार की महक
कुछ और ही,होती है ।।
- देवेन्द्र थापक , भोपाल
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