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समीक्षा : मातृभूमि, मातृभाषा से प्रेम व्यक्त करती हैं - 'कविता की पगडंडियां ' -- लतिका जाधव, पुणे


 

 समीक्षा : 

मातृभूमि, मातृभाषा से प्रेम व्यक्त करती हैं  - 'कविता की पगडंडियां '

(सिंधी काव्य का हिंदी अनुवाद) 

अनुवादक – देवी नागरानी

समीक्षा: द्वारा - लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र) 

      आरंभ में देवी नागरानी अपना मन्तव्य लिखते हुए प्लेटो की पंक्तियों का संदर्भ देती है,“ प्लेटो ने कहा था, कवि की आत्मा में एक प्राकृत उन्माद होता है और वही उसे कविता करने को प्रेरित करता है” ( पृ.09) सचमुच यही भाव आपको अनुवाद की प्रेरणा देते है। सिंधी भाषा से प्रेम और सिंधी कवियों की कविताओं का हिंदी में अनुवाद यह आपके मन की विशालता का परिचय है। 

इस काव्य संग्रह में सिंध और हिंद के सिंधी रचनाकारों की अरबी लिपि में लिखी कविताओं का हिंदी की देवनागरी लिपि में अनुवाद किया गया है। सिंधी भाषा के चौतीस (34) कवियों की रचनाओं का हिंदी में अनुवादित यह काव्य संग्रह है। 

यह संग्रह दो भागों में है। प्रथम में सिंधी भाषा से हिंदी भाषा में अनुवादित गज़ल और गीत है। दूसरे भाग में कविताएँ और नज़्में वह भी सिंधी भाषा से हिंदी भाषा में अनुवादित की गई है। 

देवी जी की,  ‘गूंगी-बहरी-बेपरवाज' रचना में पीड़ा की गहराई उभरती है। यह कविता संग्रह में शुरुआत का पन्ना है। आगे उनकी अपनी गज़ल में सिंधी ज़बाँ से, हिंदुस्तान से प्रेम की बात है। जैसे कि, 

“जहाँ सिंधी भाषा के महकें सुमन

वो सुंदर हमें गुलसिताँ चाहिए” (पृ.17)

ग़ज़ल का अपना एक अंदाज होता है। गम, खुशी, प्रेम, बिरहा में भीगे शेर अपना गहरा प्रभाव छोड़ दिया करते हैं। दिल को छू लेनेवाला यह प्रभाव ही ग़ज़ल की लोकप्रियता का कारण है।  सिंधी भाषा जो रोजमर्रा का हर पहलू खूबसूरती से निखारती थी। अब शायर के मन में उसके अस्तित्व को लेकर आशंका सी उठ रही है।

जैसे कि, 

“ऐ अल्लाह! न यूँ हम किताबों में पढ़ लें

कि थी सिंध और सिंध वालों की भाषा” – नारायण श्याम ( पृ 18)


 सिंधी भाषा से प्रेम हर कवि की कविता का अंतरंग है। जीवन के  संघर्षों में भाषा को बचाना, संस्कृति को बचाना कठिनाई होती है। विभाजन की त्रासदी में किसने क्या खोया, इस बात पर अब  और भी अलग अलग दास्तानें सामने आ रही है। एक पूरी पीढ़ी अपने आप को, भाषा- संस्कृति सहित बचाने की पराकाष्ठा कर रही थी। तबतक आनेवाली पीढ़ियों का अपनी भाषा से संपर्क नाममात्र हो गया है। विभाजन की त्रासदी में प्रदेश बदलना। अपनी पहचान नये प्रदेश में कायम करना। सिंधी समाज के लिए भी बेहद बड़ा संघर्ष था। इस बात को जानने के बाद  इन कविताओं का अंतरंग 

मार्मिक बनता जाता हैं।

जैसे कि,


 “होते – होते है हो गई शायद

थोड़ी पहचान  राजदारों  से” – ( पृ.24) अर्जुन ह़ासिद का यह शेर बहुत कुछ कहता है। 

इन गज़लों में प्रेम, बिरहा है, लेकिन एक टीस हमेशा बहुत कुछ खोने की भी है। 


“सुख इस घड़ी में है तो दुख दूसरी घड़ी

दुख की घड़ी पे ‘शाद' रहा ऐतबार है”- अर्जन ‘शाद' (  पृ. 26) 


“गुलिस्ताँ इक बार ऐसा उजड़ा उजड़ा ही रहा

गुल वहाँ कैसे न जाने बागबां बोते रहे” – कृष्ण राही ( पृ.29)

 

 दूसरा भाग  कविताओं का, कवियों ने आंखों देखी सच्चाईयों  को कविताओं में अभिव्यक्त किया है। यह सच्चाई जो आज भी नज़र आती हैं। 


“ एकता के विषय पर/ की गई जोरदार मीटिंग/ हुईं दलों की बातें/ लम्बी- लम्बी दलीलें/बहस की समाप्ति हुई/ मुक्कों, घुसों, गालियों से” ( पृ.43)– हून्दराज बलवानी की यह कविता कभी कभी एकता का मुद्दा भी तमाशा कैसे बन जाता है। इस मुद्दे को उजागर करती है। 

सिंधी कवयित्रियों का स्वर भी भारत की स्वतंत्रता को अपनत्व से व्यक्त करता है। वैसे ही अपने अस्तित्व की खोज़ भी करता है। जैसे कि, 

“मैं और तुम/कभी साथ- साथ नहीं चले/ रास्ते पर चलते तुम आगे आगे/ जैसे कोई चरवाहा/और पीछे/रस्सी से बंधी किसी गाय की तरह मैं!” ( पृ.40) विम्मी सदारंगानी की यह कविता जिन प्रतीकों से अपने अस्तित्व को दर्शाती हैं, यह स्पष्टता वास्तव और  विचलित करनेवाली है। 

वैसे ही, निराशा से सकारात्मक बदलाव की राह तलाशती अतिया दाऊद लिखती है, 

“मैं खौफ़ की दलदल में हाथ – पैर मारना नही चाहती/ऐ मेरे देश के सृजनहार /ऐसा कोई अमर गीत लिख/ कि जबर की सारी जंजीरें तोड़कर/ मैं छम छम छम छम नाचने लगूँ (पृ.76) 

कविता कम शब्दों में कवियों के अहसासों को हम तक पहुंचाती है। 

सभी कविताएँ मातृभूमि, मातृभाषा से प्रेम व्यक्त करती हैं। चुनिंदा कवियों का यह संग्रह समाज, देश और बदलाव पर भी ध्यान केंद्रित करता है। द्वेष से दूर रहकर अपनी संस्कृति को समझना, प्रेम को शाश्वत मानना। यह सब शांति और सदभाव बढ़ाने की रीति है। जो इन कविताओं में दिखाई देती है। 

आखिर कवि होता क्या है? इस बात को भी देखिए, 

“कवि/एक पौराणिक कथा का परिंदा है/

उडान भरता रहता है/तब तक, जब तक/

वह निष्प्राण होकर गिरता नहीं” (पृ.80) 

शेख अयाज़ की यह कविता कवि के अवतार कार्य का अनूठा चित्रण है। एक खोज़ है, भाषा के अस्तित्व की मांग है। सिंधी कवियों ने शांति से अपनी बात कही है। 

कविता में हमारे समय का प्रतिबिंब होता है। उस समय की राजनीति, सामाजिक बदलाव और संस्कृति का बदलता ढांचा दिखाई देता है। कवि जो अपने समय की, सपनों की बात करता है। वह आगे जाकर इतिहास बन जाता है। महिलाओं को आज भी अपने हक के लिए लड़ना पड़ता है। वह अपने अस्तित्व को अब खोना नहीं चाहती है।यह प्रभावी पक्ष यहाँ दिखाई देता है।कवियों को सभ्य समाज में समानता, न्याय की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह काव्य संग्रह हमारे देश के सिंधी भाषा के कवियों का अनुपम अभिव्यक्ति का गुलदस्ता है। जीवन के सारे रंगों को समेटा गया है। हिंदी में अनुवादित इन कविताओं का पाठक जरूर आनंद लेंगे। अनुवादक देवी नागरानी जी द्वारा किया गया यह कविताओं का अनुवाद हिंदी भाषा से सिंधी भाषा को जोड़ने का सेतु बन गया है। 

द्वारा – लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र) 

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कविता की पगडंडियां

(सिंधी काव्य का हिंदी अनुवाद) 

अनुवाद – देवी नागरानी

बोधि प्रकाशन, जयपुर, 06

प्र.सं. 2019, मूल्य : 150/-

पृ. सं.104

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

3 Comments

  1. संपादक, श्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,

    मेरी लिखी समीक्षा प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! 🙏

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  2. संपादक,
    श्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,
    मेरे द्वारा लिखी समीक्षा प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
    लतिका जाधव

    ReplyDelete
  3. समीक्षा पढी। बेहतरीन है। लेखिका जाधव जी की कथन शैली पूरी पुस्तक से परिचय करा देेती है। बहुत बहुत शुभकामनायें।

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