काव्य :
टके सेर खाजा
दरकती सड़कों के नीचे
विश्वास का पुल टूट जाता है,
नदियों में केवल पानी नहीं,
जनता का भरोसा भी बह जाता है।
राजकोष का घड़ा
रोज थोड़ा-थोड़ा रिसता है,
पर सत्ता के आँगन में
उत्सव का दीपक फिर भी हँसता है।
परीक्षा की घंटी बजती है,
सपनों की आँखें चमक जाती हैं,
पर प्रश्नपत्र के उड़ते पन्नों संग
मेहनत की रातें बिखर जाती हैं।
किसकी कॉपी पर
कृपा की मुहर लग जाए,
कौन बिना सीढ़ी के
मंज़िल तक पहुँच जाए—
कोई हिसाब नहीं मिलता।
सच तो यह है कि
जब रखवाला ही
ताले की भाषा समझ जाए,
चाबी का चमकता गुच्छा
ईमान की जेब से फिसल जाए।
चारों ओर जैसे
मूल्यों का मेला लगा है,
जहाँ सत्य धूल फाँकता है
और झूठ रेशम ओढ़े खड़ा है।
देखकर यह सब
मन बार-बार पूछता है—
क्या आज भी
वही अंधेर नगरी बसी हुई है?
जहाँ
टके सेर भाजी,
टके सेर खाजा है.
- शेफालिका सिन्हा
रांची, झारखंड।
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