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सरोकार : गृहिणियाँ हैं राष्ट्र निर्माता: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला - डॉ. चन्दर सोनाने , उज्जैन


 

सरोकार : 

गृहिणियाँ हैं राष्ट्र निर्माता: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

   - डॉ. चन्दर सोनाने , उज्जैन

        हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं सिर्फ होममेकर नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हैं। वाहन दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि महिला की मृत्यु घरेलु देखभाल का नुकसान है। मुआवजे की गणना के लिए महिला के घरेलु श्रम का मूल्य कम से कम 30 हजार रूपए प्रतिमाह माना जाए। यह राशि हर तीसरे साल 10 प्रतिशत बढ़ेगी।

       सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस श्री संजय करोल और कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 25 साल पहले एक हादसे में अपनी पत्नी को खो चुके व्यक्ति के लिए 62 लाख 77 हजार रूपए का मुआवजा मंजूर किया। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला अन्य मामलों में भी उदाहरण बनेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में वाहन दुर्घटना पर महिला की मौत पर मुआवजे से जुड़े सभी मामलों में घरेलु देखभाल के नुकसान का अलग मद जुड़ेगा। 

 उल्लेखनीय है कि अब तक गृहिणियों की मौत पर मुआवजा तय करते समय उनकी आय न्यूनतम मजदूरी के आधार पर मानी जाती थी। उन्हें कुशल या अकुशल मजदूर की श्रेणी में रखा जाता था। इस पर कोर्ट ने कहा कि ये महिला के योगदान का गंभीर अवमूल्यन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गृहिणी परिवार के कमाऊ सदस्य पर निर्भर मानी जाती है, जबकि असल में घर की व्यवस्था काफी हद तक उस महिला पर ही निर्भर होती है। कोर्ट ने लैंगिक भूमिकाओं पर यह भी कहा कि शादी का मतलब नौकरानी रखना नहीं हैं। 

  सर्वोच्च न्यायालय का उक्त फैसला हरियाणा में 2001 में एक हादसे में महिला की मृत्यु से जुड़ा हुआ है। महिला के पति और तीन बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण से मुआवजा मांगा था। अधिकरण ने 2003 में 2 लाख 42 हजार रूपए का मुआवजा मंजूर किया था। इस फैसले से नाखुश परिवार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने 2024 में जारी फैसले में मुआवजा बढ़ाकर 8 लाख 43 हजार कर दिया। साथ ही 7.5 प्रतिशत ब्याज भी देने का आदेश दिया था। इस फैसले से भी असंतुष्ट दावेदार सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था। 

  सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े सभी प्रकरण एक साल में निपटाएं जाने चाहिए और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीशों को इसकी निगरानी करनी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि 4 साल से अधिक समय से लंबित मामले पहले निपटाएं जाने चाहिए। 

सर्वोच्च न्यायालय का उक्त आदेश अत्यन्त महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला है। इसका सही मायने में क्रियान्वयन देशभर में चल रहे मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े सभी प्रकरणों में किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार गृहिणी को मात्र होममेकर नहीं मानते हुए राष्ट्र निर्माता बताया है। यह फैसला भविष्य में सभी पर लागू होगा। यह भी इस मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला है। अब देश के सभी उच्च न्यायालयों को और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण को अपने फैसले लेते समय सर्वोच्च न्यायालय के उक्त ऐतिहासिक फैसले को नजीर मानते हुए अपने फैसले देना चाहिए, तभी सुप्रीम कोर्ट का आदेश सार्थक सिद्ध होगा। 

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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